समकालीन भारतीय रंगकर्म का परिदृश्य

मृत्युंजय प्रभाकर भारतीय रंगमंच जाने किस दौर में है. इसके विकास को किस रूप में देखा जाए. इसे समझना और सूत्र में ढालना अब बहुत मुश्किल हो गया है. एक […]

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समकालीन भारतीय रंगकर्म का परिदृश्य

मृत्युंजय प्रभाकर भारतीय रंगमंच जाने किस दौर में है. इसके विकास को किस रूप में देखा जाए. इसे समझना और सूत्र में ढालना अब बहुत मुश्किल हो गया है. एक […]

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किसी कविता सी गुजरती है ‘मसान’

मृत्युंजय प्रभाकर तू किसी रेल सी गुजरती है मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ दुष्यंत कुमार की ये पंक्तियां फिल्म ‘मसान’ का कनेक्टिंग पॉइंट हैं, जो बदलते दृश्यों और कथानक […]

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किसका आत्म किसकी कथा: आत्मकथा

मृत्युंजय प्रभाकर जीवन को समग्रता में देखने-सुनने की कोशिशें नई नहीं हैं. कई बार यह किसी दूसरे व्यक्ति के द्वारा किया जाता है तो कई बार व्यक्ति खुद ही एक […]

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रिटर्न टू पोंगापंथी उर्फ़ ‘तनु वेड्स मनु रिटर्न्स’

मृत्युंजय प्रभाकर अगर मैं इस फिल्म पर नहीं भी लिखता तो कुछ नहीं बदलता. जैसे इस लेख के लिखने के बाद भी नहीं बदलेगा. कारण यह कि फिल्म एक निर्मित […]

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भारंगम – कुछ रंग कुछ भंग

मृत्युंजय प्रभाकर रंगप्रमेमियों के जीवन में रंग भरने वाला रंग महोत्सव राजधानी दिल्ली के सांस्कृतिक केंद्र के तौर पर विख्यात मंडी हाउस में इस बार 8-22 जनवरी तक गुलजार रहा. […]

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समाज के सड़ांध का आईना है – ugly

मृत्युंजय प्रभाकर ‘ugly’ क्या है? यह सवाल पूछने से बेहतर है कि यह पूछा जाए कि क्या ‘ugly’ नहीं है? जिस समाज में हम रहते हैं उस समाज में हमारे […]

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हमने भी ‘हैदर’ देखी है

मृत्युंजय प्रभाकर बचपन से मुझे एक स्वप्न परेशान करता रहा है. मैं कहीं जा रहा हूँ और अचानक से मेरे पीछे कोई भूत पड़ जाता है. मैं जान बचाने के […]

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रंग रसिया : फिल्मी पर्दे को कैनवस में बदलता सिनेमा

  मृत्युंजय प्रभाकर ‘रंग रसिया’ जब से देखी थी तब से मेरे भीतर एक खास तरह की बेचैनी घर कर गई थी। मुझे इस फिल्म पर लिखना ही था। इस बीच कई […]

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