समकालीन भारतीय रंगकर्म का परिदृश्य

मृत्युंजय प्रभाकर

भारतीय रंगमंच जाने किस दौर में है. इसके विकास को किस रूप में देखा जाए. इसे समझना और सूत्र में ढालना अब बहुत मुश्किल हो गया है. एक समय था जब सुविधाएँ बहुत कम थीं. आयोजन (थिएटर फेस्टिवल) न के बराबर थे लेकिन तब नाटकों की चर्चा थी. निर्देशकों का नाम और काम चर्चे में रहते थे. अभिनेताओं के काम के चर्चे होते थे. सुदूर किसी इलाके का रंगकर्मी किसी केंद्र या परिधि में हुए उल्लेखनीय काम को जानता था, सराहता था, उस पर चर्चा करता था. आज क़स्बे-क़स्बे तक बड़े आयोजन (थिएटर फेस्टिवल) हो रहे हैं लेकिन वैसी चर्चाएँ सिरे से गायब हैं. आम तौर पर मेरी बात रंगकर्मियों से ही होती है चाहे आमने-सामने हो, या फ़ोन पर, या सोशल मीडिया पर. कई सारे आयोजनों में ललक के साथ जाता हूँ कि कुछ अच्छा देखने को मिलेगा लेकिन बात आखिर ढाक के पात ही साबित होती है. इतने बड़-बड़े आयोजन, इतनी बडी-बड़ी चयन समिति और उसके चोंचले पर न कहीं किसी नाटक की चर्चा, न निर्देशक की, न किसी अभिनेता की. तो क्या हमारा रंगमंच सच में उस स्थिति में पहुँच गया है जहाँ कुछ भी उल्लेखनीय नहीं रह गया है? या हमारा एक्स्पोजेर इतना बढ़ गया है कि जो भी हो रहा है, आँख के सामने घट रहा है, वो औसत या कमतर दिखता है? कहीं ऐसा तो नहीं कि पहले काम कम देखना होता था इसलिए चर्चा ज्यादा होती थी? क्यूंकि उन चर्चाओं में ज्यादातर तो सुनी-सुनाई बात ही दोहराई जा रही होती थी. अब चूँकि सब सामने है तो उसका जादू खत्म हो गया है क्यूंकि वो गोपन नहीं रहा?

अपने देखे के अनुभव पर कहूँ तो मैं आज भी अच्छे नाटक, अच्छा अभिनय, अच्छे दृश्य, और रंगानुभाव से चमत्कृत होता हूँ हालाँकि ऐसे अवसर बहुत कम आते हैं. हबीब तनवीर, एच. कन्हाईलाल. आदि वरिष्ठ निर्देशकों के काम देखकर सच में उन चर्चाओं को जीने का अवसर मिला, जो सुनते हुए रंगमंच में आगे बढ़ा. उसके बाद की पीढ़ी में रतन थियम, बंसी कौल, रामगोपाल बजाज, परवेज़ अख्तर, त्रिपुरारी शर्मा, अनुराधा कपूर, संजय उपाध्याय, सुनील शानबाग़ आदि का काम पसंद आता है. हमारे समकालीन नई पीढ़ी में शंकर वेंकटेशवरण, एम.जी. ज्योतिष, सुमन मुखोपाध्याय, अतुल कुमार, मानव कौल, रणधीर कुमार, प्रवीण गुंजन आदि निर्देशकों के काम उल्लेखनीय लगते हैं. बहुत सारे नाम यहाँ छूट भी रहे हैं. अभिनेताओं की बात छोड़ रहा हूँ क्यूंकि बहुत कम अभिनेता हैं जो लगातार रंगमंच ही कर रहे हैं. हिंदी पट्टी में तो इस बात का निहायत ही अभाव है कि कोई लम्बे समय तक सिर्फ अभिनय करे. चार नाटक करते ही अभिनेता निर्देशक की भूमिका में आ जाते हैं या कहीं और का रुख कर लेते हैं. नाट्य लेखन की अगर अलग से चर्चा की जाए तो रामेश्वर प्रेम, असगर वजाहत, त्रिपुरारी शर्मा आदि वरिष्ठ नाटककारों के अलावा हमारे दौर में जिन नाटककारों ने अपने नाटकों से प्रभावित किया उनमें पहला नाम मैं शाहिद अनवर का लेना चाहूँगा. उनके अलावा रामू रामनाथन, सुमन कुमार, जयवर्धन, मानव कौल और आसिफ अली ने अपने नाटकों से लोगों का ध्यान अपनीतरफ खींचा है.

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