किसी कविता सी गुजरती है ‘मसान’

Masaan-Movie-मृत्युंजय प्रभाकर

तू किसी रेल सी गुजरती है

मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ

दुष्यंत कुमार की ये पंक्तियां फिल्म ‘मसान’ का कनेक्टिंग पॉइंट हैं, जो बदलते दृश्यों और कथानक के बीच आकर दर्शकों को एक बार फिर अपने साथ जोड़ लेती है. फिल्म चलती नहीं – बहती है, वैसे ही जैसे हवा बहती है, नदी का पानी बहता है, शरीर में खून बहता है, शराबियों और गंजेड़ियों के शिराओं में नशा बहता है या प्रेमियों के नसों में प्यार बहता है – बिल्कुल आहिस्ता, रफ्ता-रफ्ता, बिना शोर! यह फिल्म आपसे होकर ठीक वैसे ही गुजरती है जैसे नामालूम वक़्त में कविता आपसे होकर गुजरती है- आपको आहिस्ता-आहिस्ता अपने भीतर समेटते हुए. और ठीक वैसे वक़्त में ख़त्म हो जाती है जब लगता है इसे तो और बहना था, थोड़ा और चलना था, थोड़ी दूरी और तय करनी थी, एक बार फिर ठीक वैसे ही जैसे टूटा हुआ दिल पुकारता है:

अभी न जाओ छोड़कर

कि दिल अभी भरा नहीं

या फिर भूपेन हजारिका का गीत उभरता है :

समय ओ धीरे बहो

दूर है पी का गाँव

दो टूटे हुए दिल जब एक फ्रेम में समाते हैं तो ऐसा ही लगता है. फिर किसी कहानी की आस बंधते हुए भी नहीं बंधती क्यूंकि कहानियों के मोड़ खतरनाक होते हैं- बहुत हद तक जानलेवा. फिर भी जानने की उत्सुकता रह जाती है. जैसे अच्छी कविता समाप्त होकर भी आपके भीतर रह जाती है, वैसे ही ‘मसान’ पर्दे पर समाप्त होकर भी नहीं होती, यह आपके भीतर चलने लगती है, आपके शिराओं में घुलने लगती है, आपकी साँसों में महकने लगती है- वैसे जैसे प्रेम महकता है.

‘मसान’ के बारे में क्या कहूँ. इस देश की गोबरपट्टी (हिंदीपट्टी) में पैदा होने वाला और इसके मुफ्फसिल टाउन में किशोर उम्र गुजारने वाला हर लड़का या लड़की, कहीं न कहीं, अपने दिल के किसी कोने में एक जलता ‘मसान’ लिए घूम रहा है. यहाँ का हर शख्स जख्मी दिल है- आहत और टूटा हुआ. शायद ही यहाँ कोई नसीब वाला हो जिसके जीवन में पहला प्यार फला हो. ज्यादातर ने तो अपने दिल को ही कब्रिस्तान बना लिया है और खुद को उसी मुर्दा भट्टी में तपाते हुए जिए चले जाते हैं- कुछ-कुछ ऐसे जैसे जीवन नहीं जी रहे बल्कि खानापूर्ति कर रहे हों.

फिल्म में कहीं भी कोई आशावाद नहीं है. कहीं एक क्षण में भी ऐसा कुछ नहीं घटता जिसे लेकर कोई उम्मीद बंधती हो. फिल्म में कोई चमत्कार नहीं घटता, संयोग भले घटता हो. और कुल मिलाकर यह एक त्रासद फिल्म ही कही जाएगी. लेकिन  ‘मसान’ की सबसे अच्छी बात यह है कि जीवन की त्रासदिओं को उकेरने के बावजूद यह जीवन से निराश करने वाली फिल्म नहीं है. यह जीवन को लेकर कोई नकारात्मकता फैलाने वाली फिल्म नहीं है. इसके बरक्स जीवन के तमाम कड़वाहटों के बीच यह फिल्म जीवन को लेकर कोई कड़वाहट पैदा नहीं करती बल्कि इसके छलावों पर फीकी मुस्कान डालकर आगे बढ़ जाना सिखाती है.

फिल्म दो समान्तर चलने वाली कहानियों के गुम्फन से बनी है. वैसे ही जैसे दो समान्तर चलने वाली रेल की पटरियाँ चलती हैं- दूर, बहुत दूर तक बिना मिले. हालाँकि बहुत दूर जाकर मिलती हुई जरूर प्रतीत होती हैं पर वास्तविकता में, उनकी रेखाओं में मिलना कहाँ होता है. फिल्म जहाँ ख़त्म होती है, लेखक-निर्देशक दो टूटे दिलों के करीब आने आभास भले छोड़ जाता हो पर कौन जानता है वो सच में करीब आते भी हों या नहीं. मुझे तो लगता है कि मिलना तो छोड़ दें एक फ्रेम में न आते तो ही अच्छा होता.

‘मसान’ दो युवाओं की कहानी है- देवी पाठक और दीपक चौधरी की. दोनों के पिता बनारस के गंगा घाट की कमाई खाते हैं, भले ही उनका पेशा अलग हो. एक का पिता पूजा-पाठ करवाता है तो दूसरे का पिता लाश जलाने का काम करता हैIndian-film-Masaan. दोनों एक ही घाट पर बड़े हुए हैं लेकिन एक दूसरे से नहीं मिले होते, कारण एक ही घाट से जीवन पार लगाते हुए भी दोनों के बीच का जातीय अंतर. पूरी फिल्म इसी जातीय अंतर को पाटने और आधुनिक मनुष्य के जीवन के एक जैसी पीड़ा की व्याख्या करती हुई आगे बढ़ती है और अंत में दोनों को लाकर एक ही घाट पर खड़ा कर देती है. जहाँ से पार पाने के लिए दोनों एक ही नाव पर सवार होते हैं, जो उन्हें लेकर दूसरे छोर की तरफ बढ़ जाती है.

फिल्म का आदि, मध्य और अंत तीनों ही सहज हैं. दरअसल सहजता ही इस फिल्म की थाती है. यह किरदारों को कभी ‘लार्जर दैन लाइफ’ ट्रीट नहीं करती. न ही उन्हें लेकर कोई ‘रोमांटिसिज्म’ बुनने देती है और फिल्म के आखिरी दृश्य में आशावाद का एक तिनका छोड़ दें तो कहीं भी नाटकीय तरीके से जीवन जैसा है उससे बेहतर दिखाने या बनाने की कोशिश नहीं करती. जीवन अपनी कठोरता में जैसे चलायमान है ठीक वैसे ही पर्दे पर घटित होता है.

फिल्म के एक छोर पर कहानी के नायक हैं वहीँ दूसरी छोर पर पिता हैं. पिता हमारे गोबरपट्टी में बचपन से लेकर एक खास उम्र तक जीवन के सबसे कड़क पात्र होते हैं जो युवा हो चुकने के बाद उनके जीवन में ही किसी टीन के कनस्तर में तब्दील हो जाते हैं. हमारा समाज सार्वजानिक या निजी तौर पर भी घृणा और गुस्सा दिखाने में तो सहज है लेकिन प्यार दिखाने में संकोच करता है. हिंदी पट्टी में पिता हमारे इस घुटे हुए समाज के वाहक भी हैं और सबसे बड़े भोक्ता भी. इस फिल्म में पिता का किरदार निभा रहे सभी पात्र हिंदी पट्टी के प्रतिनिधि पात्र हैं- जो अपने बच्चों के लिए चिंतित तो हैं, उसका भला करने के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं लेकिन अपना प्यार जताने में सहज नहीं हैं.

ज्यादातर फिल्मों में स्थान बस एक ईकाई होकर रह जाते हैं. स्थान की वजह से ज्यादा कुछ नहीं घटता. शहर दिखाना हो तो दिल्ली हो या मुंबई, कहानी का लोकेल बदल दिया जाए तो चंद दृश्यों के अलावा कुछ नहीं बदलता. यही हाल गाँव आधारित फिल्मों का है, जो अब गिनती की ही बनती हैं. ‘मसान’ फिल्म में शहर भी एक पात्र की तरह है. यहाँ होने वाली घटनाएँ, चलने वाली जिंदगियां, ली जाने वाली साँसें और बहने वाली हवा, ऐसी इसलिए हैं कि यह बनारस है. फिल्म में बनारस के होने से किरदार हैं, उनकी ज़िन्दगी है और उनके सूख-दुःख हैं. यह इस फिल्म की एक बड़ी खासियत है.

एक छोटे से शहर में प्रेम जैसे घटता है, पौधे से पेड़ बनता है और कनात की तरह शहर भर में तन जाता है- वैसे ही ‘मसान’ में भी प्रेम पनपता है. यहाँ प्रेम निहायत ही निजी भावना होकर भी सामूहिकता के जोर से ही अपने डैने फैलाता है, जिसमें दोस्तों की जोरदार भूमिका होती है. ‘मसान’ में सब कुछ वैसे ही घटित होता है, जैसे की छोटे शहरों में जीवन घटित होता है, दोस्ती से लेकर प्रेम तक, सूख से लेकर दुःख तक.

फिल्म की एक खासियत यह भी है कि फिल्म में शामिल होने वाले सारे किरदारों की अपनी ज़िन्दगी है, अपनी साँसें हैं और अपनी कहानियां हैं. वे यहाँ नायक-नायिका के सहायक की भूमिका में न होकर, अपनी ज़िन्दगी जीते नजर आते हैं. छोटे-छोटे दृश्यों और कम से कम संवादों में भी वो अपनी कहानी कह जाते हैं. वह चाहे देवी के पिता विद्याधर पाठक हों, दीपक के पिता हों, masaan movieसाफ्या जी हों, झोंटा हो या दीपक के दोस्त हों. सब फिल्म के छोटे-छोटे हिस्से में अपना पूरा जीवन जीते नजर आते हैं.

अभिनय की बात करें तो फिल्म में देवी के पिता की भूमिका में संजय मिश्रा छाए हुए हैं. एक बदनाम हो चुकी बेटी के पिता होने की टीस और उसे इस झंझट से निकाल ले जाने की फ़िक्र में घुलते पिता की भूमिका में उन्होंने वो जान डाली है कि संजय भाई इस भूमिका के लिए हमेशा के लिए याद किए जाएंगे. ‘आँखों देखि’ के बाद एक बार फिर उन्होंने यह दर्शाया है कि वो कितने संवेदनशील अभिनेता हैं. उम्मीद है कि इंडस्ट्री ‘जस्ट चिल’ वाली उनकी बेहूदी भूमिकाओं के इतर भी, जिनमें भी वो कमाल करते हैं, उनके लिए अब नए किरदार गढ़ेगी.

दीपक के पिता की भूमिका में अभिनेता विनीत कुमार एक बार फिर बहुत थोड़े से फ्रेम में भी आपको भीतर तक वेध जाते हैं. समाज के सबसे निचले पायदान पर आने वाले और डॉम राजा जैसे नकली पदवी से सम्मानित कम उसकी बखिया उधेड़ने वाली भूमिका में उन्होंने अपने संवादों से अधिक अपनी भाव-भंगिमाओं से काम लिया है. आप तौर पर लाऊड भूमिकाओं के लिए जाने जाने वाले विनीत कुमार में बहुत ही सहजता से अपने किरदार को रूपायित किया है. यह किरदार उन्हें पर्दे पर देखने की भूख और बढ़ा देती है.

फिल्म में तीसरे जानदार किरदार हैं साफ्या जी, जिसे निभाया है पंकज त्रिपाठी ने. गिने-चुने तीन दृश्यों में वह जो प्रभाव छोड़ जाते हैं वो कमाल की बात है. हिंदी पट्टी के आम युवा के किरदार को जिस तरह से उन्होंने अपने अभिनय से हमारे सामने खड़ा किया है वह निहायत ही महीन किमियादारी की मांग करती है. पंकज भी अब तक ज्यादातर लाऊड भूमिकाओं के लिए ही जाने जाते रहे हैं लेकिन इस भूमिका में उन्होंने साबित किया है कि वे ऐसे अभिनेता हैं जिनकी भूख अभी मिटी नहीं है.

फिल्म के मुख्य किरदारों में दीपक की भूमिका में विकी कौशल ने शानदार काम किया है. एक छोटे शहर के थोड़े डरे और थोड़े सपनीले युवा के किरदार में उन्होंने अपने शांत और सहज अभिनय से जान डाली है. वह पूरी फिल्म में कहीं भी लाऊड होते नहीं दीखते और प्रेम में होने के दृश्यों और विरह में टूटने के दृश्यों में तो कमाल ही कर जाते हैं. उनकी प्रेमिका शालू, जो एक चुलबुली लड़की है, की भूमिका में श्वेता त्रिपाठी ने भी जोरदार उपस्थिति दर्शाई है.

देवी की भूमिका में ऋचा चड्ढा ने एक बार फिर साबित किया है कि वे ऐसी अभीनेत्री हैं जो किसी भी किरदार में जान डालने का दम-ख़म रखती हैं. पूरी फिल्म में एक युवा लड़की की जीजिविषा और छटपटाहत को जिस तरह खामोश निगाहों और भावों के समंदर में गोते लगाते भंगिमाओं से सामने लाती हैं वो काबिले-तारीफ है. हिंदी फिल्मों का यह सौभाग्य है कि उसके पास ऋचा जैसी अभिनेत्रियाँ मौजूद हैं. वैसे भी जीवन से अन्य क्षेत्रों की तरह अभिनय में भी लड़कियां अब लड़कों को जमकर टक्कर दे रही हैं.newmasan

फिल्म के लेखक वरुण ग्रोवर और निर्देशक नीरज घायवन के बारे में कहने के लिए मेरे पास कुछ नहीं है. जिस तरह की कसी हुई और संतुलित फिल्म उन्होंने गढ़ी और बनाई है वह भारतीय सिनेमा के इतिहास में हमेशा के लिए याद की जाएगी. यह फिल्म निश्चित तौर पर आने वाले वक़्त में ‘पाथेर पांचाली’ और ‘मेघे ढाके तारा’ की श्रेणी में शामिल की जाएगी क्यूंकि ‘मसान’ फिल्म नहीं है- एपिक है, कविता है, नदी है, हवा है, पानी है, आग है, राग है, और इससे होकर गुजरना जीवन के सबसे सघन अनुभवों में शामिल है.

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