किसका आत्म किसकी कथा: आत्मकथा

मृत्युंजय प्रभाकर

जीवन को समग्रता में देखने-सुनने की कोशिशें नई नहीं हैं. कई बार यह किसी दूसरे व्यक्ति के द्वारा किया जाता है तो कई बार व्यक्ति खुद ही एक खास उम्र के बाद अपने जीवन को लौटकर देखता है और उसे सन्दर्भों सहित दर्ज करता है. हालाँकि यह अवसर भी दुनिया में चुनिंदे लोगों को ही नसीब होता है, जो या तो खुद अपने जीवन को समग्रता में लौटकर देखते हैं या किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा उनके जीवन का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया जाता है. यह ‘वर्गभेद’ का मसला भले न हो पर ‘विशेषताबोध’ का मसला जरूर है. मेरा अपना यह आकलन है कि ज्यादातर ऐसे लोग अपने जीवन को लौटकर समग्रता में देखने की कोशिश करते हैं जो नहीं चाहते कि उनकी बनाई ‘खास छवि’ के विपरीत कोई ‘छवि’ बाद में उभरकर आए. इसीलिए वह दुनिया छोड़ने के पूर्व अपने जीवन के सुनहरे पृष्ठ कागज़ पर अंकित कर जाते हैं. वैसी बातों को चिन्हित कर जाते हैं जो उन्हें महानता के खांचे में फिट बिठाते हों और वैसीबातों को या तो दरकिनार या गोल कर जाते हैं जो उन्हें महानता की कुर्सी से लुढकाने का माद्दा रखती हैं. दुनिया की ज्यादातर आत्मकथाएं लेखक की चालाकियों के अदभुत दस्तावेज हैं. जिनमें आप उनकी विशेषताओं, खासियतों और महानताओं का तो भरपूर जिक्र पाते हैं लेकिन उनकी कमजोरियां, बदनीयती और बदगुमानियां सिरे से लिप-पोतकर बराबर कर दी जातीं हैं या फिर सिरे से गोल कर दी जाती हैं. इस लिहाज से कोई भी ‘आत्मकथा’ दरअसल लेखक का पक्ष मात्र हो जाने को अभिशप्त हो जाती है. उस ‘आत्मकथा’ के जरिए असली लेखक को जान पाना असंभव नहीं तो मुश्किल काम जरूर हो जाता है.

महेश एलकुंचवार लिखित नाटक ‘आत्मकथा’ भी एक लेखक की ऐसी ही स्याह हकीक़तों से वाकिफ करवाता है. ‘आत्मकथा’ की कहानी बहुत ही सरल है. एक बहुत सम्मानित लेखक हैं ‘राजध्यक्ष’ जो अपनी आत्मकथा अपने साहित्य के ऊपर रिसर्च कर रही युवती को लिखा रहे होते हैं. इसी बीच साहित्य में जीवन का सच और कल्पना के घालमेल पर दोनों में विवाद छिड़ जाती है क्यूंकि लिखने वाले को लग रहा है कि लेखक सब कुछ गोल-माल कर रहा है और सही बात या तो छुपा रहा है या उस पर चुप है. चर्चा लेखक के निजी जीवन, उसके संबंधों और उसके उपन्यास में उसके रूपांतरण तक पहुंचती है. यहाँ लेखक जो अपना पक्ष रखता है, वह उसकी पत्नी और प्रेमिका के सच से मेल नहीं खाता. इस तरह पता चलता है कि लेखक हमेशा से सच और कल्पना का घालमेल करता आया है. नाटक के अंत में लेखक अपने को नई दुविधा में पाता है जब रिसर्चर उसके प्रेम में होने की घोषणा करती है और घर जाने से इंकार करती है. वह उसे जाने के लिए तो कहता है पर उसका मन उद्दिग्न रहता है.

इस नाटक का पुनर्मंचन कोलकाता की मशहूर नाट्य संस्था ‘पदातिक’ ने हाल ही में पूर्व क्षेत्रीय सांस्कृतिक परिषद् द्वारा आयोजित एक माह लम्बा चलने वाले ‘कोलकाता थिएटर फेस्टिवल’ में 6 अगस्त को संध्या 6.30 बजे किया गया. हालाँकि यह नाटक इस संस्था ने 2012 में ही तैयार किया था और देश भर के कई चर्चित नाट्य महोत्सवों में इसका मंचन हो चुका है लेकिन मुझे यह नाटक देखने का मौका इस बार ही लग सका. यह नाटक यूँ तो एक खास वजह से प्रदर्शन के पूर्व ही चर्चे में आ चुका था कि इस नाटक से हिंatmakatha-7दी फिल्मों के प्रसिद्ध अभिनेता कुलभूषण खरबंदा लगभग दो दशक बाद एक बार फिर रंगमंच पर वापसी कर रहे हैं. बीसवीं शताब्दी के 8वें और 9वें दशक में कुलभूषण खरबंदा ने एक चरित्र अभिनेता और विलेन के तौर पर बॉलीवुड में अच्छा-खासा नाम कमाया था. हालाँकि उनकी यह बुलंदी फिल्मोंके बदलते दौर में कायम नहीं रह सकी और फिल्मों के दरवाजे उनके लिए बंद भले न हुए हों पर अपना जौहर दिखाने के मौके मिलने जरूर कम हो गए. बावजूद इसके ‘हैदर’ जैसे इक्का-दुक्का फिल्मों में वो दिखते रहते हैं और अपने अभिनय का लोहा मनवाते रहते हैं. 1970-80 के दशक में बॉलीवुड में एंट्री के दो ही रास्ते माने जाते थे. या तो भरपूर थिएटर करके और अपनी पहचान बनाकर लोग फिल्मनगरी का हिस्सा बनते थे या फिर फिल्म इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडिया या राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से प्रक्षिशित लोग फिल्मों में जगह बनाते थे. कुलभूषण खरबंदा ने भी लम्बा वक़्त रंगमंच पर बिताने के बाद फिल्मों की ओर रुख किया था. इसलिए विनय शर्मा निर्देशित नाटक‘आत्मकथा’ से रंगमंच पर उनकी वापसी को ‘घर वापसी’ का दर्जा दिया गया. बॉलीवुड के बदलते स्वरुप में जब नसीरुद्दीन शाह, फारुख शेख, शबाना आज़मी और अनुपम खेर जैसे अभिनेता रंगमंच पर नई उर्जा से सक्रिय हो रहे थे ऐसे में कुलभूषण खरबंदा की ‘घर वापसी’ ऐसी कोई अप्रत्याशित बात भी नहीं थी. मेरे ख्याल से तब सवाल तो यह रहा होगा कि क्या कुलभूषण खरबंदा कैमराके लिए अभिनय की अर्जित स्वाभाविकता को एक बार फिर रंगमंच की जरूरत के अनुसार ढाल पाएंगे? खैर, इस सवाल पर बाद में लौटते हैं. पहले नाटक की चर्चा.

मैंने जब यह नाटक पिछले हफ्ते देखा तब तक इसके दर्जन भर शो तो हो ही चुके होंगे. और सच कहूँ तो पिछले कुछ सालों में जिस तरह के नाटकों से दो-चार होने का मौका मिलता रहा है वैसे में यह मेरे लिए किसी सुखद अहसास की तरह था. भारतीय रंगकर्म इस वक़्त एक ऐसे दौर में में प्रवेश कर गया है जहाँ प्रयोगों की बहार आई हुई है. तरह-तरह के रंग प्रयोगों से दर्शकों को अचंभित करना ही आधुनिक रंगमंच के प्रणेताओं का एकमात्र ध्येय रह गया है. अव्वल तो दर्शक रंगमंच के इन नए पुरोधाओं के लिए अनिवार्य तत्व रह ही नहीं गए हैं. उनके लिए कोई भी पेर्फोर्मंस अपने आप में एक इवेंट से ज्यादा महत्व नहीं रखता. उनका सारा जोर उस इवेंट को कलरफुल बनाने और रंग-रोगन करने तक सिमट गया है. यही कारण है कि आधुनिक रंग प्रयोगों के इस दौर में रंगमंच का सबसे सार्थक तत्व अभिनेता किसी चड्ढी सा झूल रहा होता है और उसके इर्द-गिर्द रंग उछल रहे होते हैं. ऐसे में जब रंगमंच से सरलता, सांकेतिकता और सार्थकता की उम्मीद खो सी गई है बिल्कुल ठीक उसी वक़्त ‘आत्मकथा’ जैसी प्रस्तुति यह अहसास दिलाती है कि रंगमंच में पहले भी इनका महत्व था और निश्चित ही जब प्रयोगों का यह धुंधला कोहरा छंटेगा तब भी इनका ही महत्व रहेगा. रंगमंच से इनके गायब कर दिए जाने का सीधा मतलब है दर्शकों से उसकी कल्पनाशीलता को छीन लेना, जो सभागार में बैठा हुआ नाटक के दृश्य के संग अपना खुद का दृश्य रच रहा होता है. हर दर्शक के लिए स्टेज पर घट या दिख रहा स्थान, काल, पात्र और परिस्थितियां बिल्कुल वही नहीं होती जो स्टेज पर दिखाया जा रहा होता है. चलते हुए नाटक के साथ सारे दर्शक अपना स्थान, काल, पात्र और परिस्थितियां खुद रच रहे होते हैं. आधुनिक रंग प्रयोग दर्शकों से उनकी कल्पनाशीलता को छीन रहा है और उसकी जगह एक बंधा-बंधाया इमेज उन्हें थमा कर चमत्कृत करने का प्रयास कर रहा है जो रंगमंच की मूल भावना के ही खिलाफ है. ‘आत्मकथा’ जैसी प्रस्तुतियां न सिर्फ रंगमंच की असली ताकत का अहसास कराती हैं बल्कि वह रंगमंच के अपने अवयवों पर भरोसा करना भी सिखाती हैं.

पदातिक भारत की उन गिनी-चुनी संस्थाओं में शामिल है जिसने भारतीय रंगकर्म और खासकर भारतीय हिंदी रंगकर्म को एक खास पहचान दी है. श्यामानंद जालान के कुशल नेतृत्व में इस संस्था में भारतीय हिंदी रंगकर्म को एक गैर-हिंदी प्रदेश में काम करते हुए भी गौरव पताका की तरह लहराया है. मुंबई, दिल्ली और कोलकाता के तीन अलग-अलग छोरों पर हिंदी रंगकर्म की पताका थामने वाले पुरोधाओं यथा सत्यदेव दुबे, इब्राहीम अल्काजी और श्यामानंद जालान ने हिंदी रंगकर्म को वह ज़मीन दी है जिसके आधार पर हिंदी रंगकर्म आज खड़ा है. इस लेखक का यह सबसे बड़ा दुर्भाग्य है की पिछले 20 साल के सक्रिय रंगमंचीय जुड़ाव के बावजूद वह इनमें से किसी भी निर्देशक का काम नहीं देख सका है. हालाँकि ‘आत्मकथा’ में काम करने वाले ज्यादातर पात्र और निर्देशक ऐसे हैं जिन्होंने पूर्व में श्यामानंद जालान के साथ लम्बे समय तक काम किया है. ऐसे में मुझे इस प्रस्तुति में उनके काम की छाप जरूर नजर आई या मैंने देखने की कोशिश की. नाटक देखते वक़्त मेरादिमाग लगातार इस बात को लेकर सतर्क था कि इस नाटक को बनाने में भले ही जालान साहब की कोई भूमिका नहीं है पर इस नाटक से जुड़े लोगों को तैयार करने में उनकी भूमिका जरूर रही है ऐसे में मेरे लिए इस नाटक से गुजरना भी श्यामानंद जालान के काम से वाकिफ होने का एक रास्ता था.

इस नाटक ने जो सबसे महत्वपूर्ण काम किया जो मेरे लिए किया, वह यह कि इसने हिंदी को नाटक की भाषा के तौर पर एक बार फिर मेरे मन में स्थापित कर दिया. पिछले इतने सालों से हिंदी रंगकर्म करते हुए भी मेरे मन में कहीं न कहीं यह बैठ रहा था कि रंगमंच का भविष्य बोलियों और क्षेत्रीय भाषाओँ में है. खड़ी बोली हिंदी स्वाभाविक तौर पर रंगमंच की भाषा नहीं है और अगर हिंदी रंगकर्म को खड़ा रहना है तो इसे अपनी बोलियों की खनक और लय उधार लेनी ही होगी. ‘आत्मकथा’ नाटक में अभिनेताओं ने हिंदी में संभाषण करते हुए जिस प्रकार इसकी लय और खनक को दर्शकों के समक्ष प्रस्तुत किया उसने मेरे मन में परत चढ़ा चुके उस विश्वास को उतार फेंका किखड़ी बोली हिंदी एक स्टैण्डर्ड लैंग्वेज होने के कारण बोलियों की स्वाभाविक लय और खनक से दूर है. मैं बहुत ही यकीन के साथ यह कह सकता हूँ कि पिछले 20 साल से हिंदी रंगमंच में सक्रियता के बावजूद मैंने ऐसी लयदार, खनकदार और अठखेलियाँ करती हिंदी स्टेज पर कम ही सुनी है. मेरे ख्याल से इस नाटक के अभिनेताओं में हिंदी का यह चलन निश्चित ही श्यामानंद जालान साहब के लम्बे प्रशिक्षण की दें है और इसी से मैं उनके रंगमंच की उस ताकत का अंदाजा लगा सकता हूँ कि उनका रंगमंच कितना सुदृढ़ और ताकतवर रहा होगा.

रंगमंच की असल जान उसी तरह अभिनताओं में बसती है जैसे पुराने जमाने के राक्षसों की जान सात समुंदर पार किसी पहाड़ी या गुफा में रखे पिंजड़े में बंद तोते में बसा करती थी. रंगमंच तब तक नहीं मर सकता जब तक अभिनेताओं की हत्या न कर दी जाए. अफ़सोस की आधुनिक रंग प्रयोगों के निशाने पर जो चीज़ें हैं उनमें से एक अभिनेता भी हैं. अभिनेता जो नाटकatmakatha - 10 की जान हैं – उसके ‘सब्जेक्ट’ हैं, आधुनिक रंगकर्म उन्हें इस गुमान में कि नाटक में निर्देशक ही सबकुछ है – एक ‘ऑब्जेक्ट’ में बदलने की कोशिश में तल्लीन है. आधुनिक अभिनेता निर्देशक के हाथ की कठपुतली में तब्दील हो चुका है. ऐसे में ‘आत्मकथा’ नाटक के अभिनेता एक बार फिर खुद को नाटक के ‘सब्जेक्ट’ के तौर पर स्थापित करते हैं. नाटक अपनी समाप्ति के उपरान्त जो प्रभाव दर्शकों के ऊपर छोड़ता है उसमें उसके ‘सब्जेक्ट’ होने की बहुत बड़ी भूमिका है. इस तरह की रंग प्रस्तुतिओं में दर्शक नाटक के बढ़ने के साथ-साथ अभिनेता के साथ एक खास तरह का एकात्म विकसित करते हैं जो आधुनिक प्रयोगों से संपन्न प्रस्तुतियों में देखने में नहीं आतीं. वह ऐसा करने में इसलिए सफल होते हैं क्यूंकि यहाँ अभिनेता एक खास चरित्र को साकार कर रहे होते हैं. ‘आत्मकथा’ नाटक के अभिनेताओं ने भी अपने शानदार अभिनय से अपने चरित्र को इस तरह से रूपायित किया कि उन चरित्रों और दर्शकों के बीच एक तरह का एकात्म कायम हुआ. यही इस प्रस्तुति की सबसे बड़ी खासियत है.

अभिनेताओं पर ठहरकर बात करें तो सारे ही अभिनेताओं ने इस प्रस्तुति में अपने अभिनय से भरपूर जान डालने का काम किया है. अभिनेताओं पर बात करते हुए मैं सबसे पहले उस अभिनेता की चर्चा करना चाहूँगा जिसने मुझे अपने अभिनय से बेहद ही प्रभावित किया. यह अभिनेता हैं अनुभा फतेहपुरिया. यूँ तो इनकी चर्चा संचयन दा के मुंह से सुनता आ रहा था पर इन्हें स्टेज पर देखने का अवसर पहली बार मिला. रिसर्चर प्रज्ञा के किरदार में अपने संवाद अदायगी, अपने हाव-भाव और सात्विक अभिनय द्वारा उन्होंने जिस प्रकार जान डाली वह उन्हें एक निहायत ही उम्दा और स्वाभाविक अभिनेता साबित करने के लिए काफी था. वसंती/वसुधा की दोहरी भूमिका में संचैयता भट्टाचार्जी ने भी कमाल के अभिनय का मुजाहिरा किया. वहीँ उत्तरा/उर्मिला की भूमिका में चेतना जालान का अभिनय भी अपने उरूज पर था. उम्र के इस दौर में जिस सहजता से उन्होंने मध्य वय और वृद्ध का किरदार निभाया वह काबिलेतारीफ था. उनकी संवाद अदायगी में हिंदी के शब्द सिक्के की तरह खनकते और अपनी ओर ध्यान खींचते नजर आए. उन्हें स्टेज पर किरदारों को जीते हुए देखना निश्चित तौर पर मेरे लिए एक अविस्मर्णीय अनुभव था. रही बात कुलभूषण खरबंदा साहब के अभिनय की तो इक्का-दुक्का असहज करने वाले अवसरों के बावजूद उनका अभिनय शांत, सहज और किरदार के मनोभावों को खोलने वाला था. स्टेज पर उनकी यह वापसी, जो यूँ तो 3 साल पहले हो चुकी है, राजनीतिक अर्थ में भले न सही पर अपने सामान्य अर्थ में ‘घर वापसी’ जैसा ही लगा.

नाटक में सेट, कॉस्टयूम, लाइट, प्रोजेक्शन और बैकग्राउंड म्यूजिक का संयोजन बेहद ही सटीक और उम्दा था. इनमें जिस तरह की सांकेतिकता बरती गई थी वह निर्देशक की कल्पनाशीलता और नाटक पर पकड़ को सहज ही स्थापित करता है. नाटक के निर्देशक विनय शर्मा नाटक की सफलता के निश्चित तौर पर हक़दार हैं. आलेख का समापन उन्हें इस बात के लिए शुक्रिया कहते हुए ख़त्म करूँगा कि हिंदी रंगकर्म को उन्होंने मात्र एक अविस्मर्णीय प्रस्तुति ही नहीं दी है बल्कि उसे इस कोहरे से भरे समय में एक दिशा भी देने की कोशिश की है.

# लेखक पिछले 20 सालों से रंगमंच के क्षेत्र में अभिनेता, निर्देशक, नाटककार, संगठनकर्ता और आलोचक के तौर पर सक्रिय रहे हैं. फिलवक्त वो विश्व भारती यूनिवर्सिटी में ड्रामा एंड थिएटर आर्ट विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर के तौर पर कार्यरत हैं.  

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