रिटर्न टू पोंगापंथी उर्फ़ ‘तनु वेड्स मनु रिटर्न्स’

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मृत्युंजय प्रभाकर

अगर मैं इस फिल्म पर नहीं भी लिखता तो कुछ नहीं बदलता. जैसे इस लेख के लिखने के बाद भी नहीं बदलेगा. कारण यह कि फिल्म एक निर्मित उत्पाद है. आप उस पर बात भले कर सकते हैं लेकिन उसे बदल नहीं सकते. दूसरे कला विधाओं में इसकी गुंजाईश बनी रहती है कि अगर उसकी कुछ कमियां नजर आएं तो कलाकार खुद ही जानने को इच्छुक रहते हैं कि कैसे इसे दुरुस्त किया जा सके. सिनेमा में यह संभव नहीं है. यही कारण है कि वह दर्शकों से न इसकी उम्मीद रखता है न ही उसके लिए इसका कोई मतलब होता है. वह भी तब जब यह एक व्यवसायिक फिल्म हो. उसपर भी तुर्रा यह कि उसने अच्छा-खासा व्यवसाय किया हो. जिस बाजार में हिट ही फिट हो का फार्मूला चलता हो, वहां और किसी बात कि गुंजाईश रह भी कहाँ जाती है. खैर, इतना सब जानते हुए भी इस फिल्म पर लिख रहा हूँ तो जाहिर है कि कुछ बातें हैं जो सामने लाना जरूरी समझता हूँ इसीलिए कर रहा हूँ.

हर सभ्यता अपने साथ कुछ नए उपकरण, सांस्कृतिक उत्पाद और मूल्यांकन के कुछ नए औजार लेकर आती है. तकनीक पूंजीवादी सभ्यता के उपकरण हैं, सिनेमा उसका सांस्कृतिक उत्पाद है और ‘पॉपुलर’ उसके मूल्यांकन का मानक औजार है. कुल मिलाकर कहें तो पूंजीवादी सभ्यता का लब्बोलुबाब बस इतना है कि जो भी पॉपुलर है वो ही सही है. यह पॉपुलैरिटी उसने कैसे हासिल की है? उसके मानक क्या रहे हैं? उसके मूल्य क्या हैं? यह सारे सवाल सफलता के साथ ही गौण हो जाते हैं. अफ़सोस कि बात यह है कि ज्ञान और संचार की सारी विधाओं में आज यही हाल है. राजनीति से लेकर, व्यवसाय और संस्कृति तक सफलता ही एक मात्र पैमाना रह गया है. यह सफलता भले ही आपने गैर-न्यायोचित तरीका अपनाकर ही क्यूँtwm2 न हासिल की हो. फिल्म ‘तनु वेड्स मनु रिटर्न्स’ उसी पॉपुलर का मानक उदाहरण है. पॉपुलर का सीधा सादा शाब्दिक अनुवाद यूँ तो लोकप्रिय बैठता है लेकिन इसके अर्थ की व्याप्ति सही तौर पर लोकप्रियतावाद शब्द में झलकती है. इसलिए जब मैं आगे पॉपुलर शब्द का इस्तेमाल करूँ तो उसे लोकप्रिय न समझकर लोकप्रियतावाद समझा जाए.

फिल्म में कहानी की जो यात्रा है वो बहुत कुछ कहती है. लंदन में शुरू हुई फिल्म हरियाणा के झज्जर इलाके  के एक गाँव में जाकर ख़त्म होती है. लंदन जहाँ तनु और मनु की शादी टूटती है और झज्जर का गाँव जहाँ जाकर शादी फिर से जुड़ती है. यह जो रूपक इन जगहों के नाम से बनते हैं वही इस फिल्म की पूरी यात्रा को दर्शाती है. यह दरअसल सिर्फ दो अलग-अलग जगहों की बात नहीं है. यह दरअसल दो अलग-अलग सोच की बात भी है. लंदन जहाँ तनु इतनी बोल्ड और आजाद ख्याल नज़र आती है कि वो अपने पति को पागल खाने में डंप करके इंडिया भाग आती है. वही तनु इस गाँव में आकर इतनी विवश नज़र आती है कि अपने पति मनु को वापस पाने के लिए सारी जिल्लतें झेलती है. एक ही किरदार तनु की दो घंटे की यह फ़िल्मी यात्रा मुझे ही नहीं, दर्शक दीर्घा में बैठे कई लोगों को चौंकाती है. यात्राएं आम तौर पर आपको आगे ले जाती हैं जबकि यह फिल्म एक उल्टी यात्रा शुरू करती है जहाँ ये तनु को पीछे ले जाती है. और अंत आते-आते यह फिल्म उस तनु के किरदार की हत्या कर देती है जो ‘तनु वेड्स मनु’ में भारतीय स्त्री की एक नई छवि गढ़ने का काम करती थी. ऐसा ही होता है जब आप सामाजिक सच्चाइयों से जान-बुझकर आँख चुराने का काम करते हैं. फिल्म के लेखक और निर्देशक की यह जोड़ी भले ही गैर-फार्मुलेदार हिट फिल्म देने का काम कर रही है लेकिन इनका वैचारिक दिवालियापन इनके प्रयोगों की हवा निकालकर रख देती है.

यूँ भी पूंजी का सारा कारोबार फॉर्म पर आकर reduce हो जाता है. यहाँ जब मैं फॉर्म शब्द का इस्तेमाल कर रहा हूँ तो इसे ‘रूप’ न समझकर ‘रूपवाद’ समझा जाए. हम सब जानते हैं कि पूंजीवादी व्यापार की जान है ‘पैकेजिंग’. यह इनकी पैकेजिंग ही है जो आपको उसके उत्पाद को खरीदने को विवश कर देती है. यह उनकी पैकेजिंग का ही कमाल है कि आप जरूरत न होते हुए भी वह सामान उठा लाते हैं जिनकी आपकी जरूरत ही नहीं है. लेकिन यह बेहतर पैकेजिंग आपको अच्छे उत्पाद की गारंटी नहीं देता है. रूप के स्तर पर भले ही लेखक-निर्देशक की यह जोड़ी प्रयोगवादी नजर आती है पर हकीक़त यह है कि कंटेंट के स्तर पर यह कहीं भी कोई जोखिम लेते हुए नहीं दीखते हैं. ‘रांझना’ के बाद ‘तनु वेड्स मनु रिटर्न्स’ में भी यह बात स्पष्ट रूप से सामने आ ही जाती है.

फिल्म का दूसरा पक्ष है. तनु के बरक्स दत्तो का किरदार. दत्तो बहुत सारे मामलों में तनु के बरक्स दूसरे सिरे पर खड़ी नजर आती है. तनु का किरदार जहाँ एक आजाद ख्याल पर कर्तव्यच्युत लड़की का किरदार है वहीँ दत्तो अपने उद्देश्य को लेकर स्पष्ट है. तनु के जीवन में कैरिएर नाम की कोई चीज़ नहीं है लेकिन दत्तो अपने कैरिएर और अपनी पहचान को लेकर गंभीर है. दत्तो को इस बात का भी ख्याल है कि उसके परिवार को उससे काफी आकांक्षाएं हैं और उसे उन्हें पूरा करना है. जिद्दी और अपने मन की करने वाली यूँ तो दोनों ही हैं लेकिन तनु जहाँ मूडी नजर आती है वहीँ वहीँ दत्तो अपनी चीज़ों को लेकर बहुत स्पष्ट है. पर अफ़सोस कि लेखक और निर्देशक दोनों ने ही इस किरदार को भी अंत में जाकर अनाथ बनाकर छोड़ दिया है. यही कारण है कि तनु भले ही मनु को एक बार फिर वापस पा लेती है लेकिन दर्शक दत्तो की छाप मन में लिए सिनेमा हॉल से बाहर निकलता है.

दरअसल फिल्म में ऐसे कई किरदार और घटनाएँ हैं जो कि लेखक और निर्देशक ने एक सीमा तक इस्तेमाल के बाद उसे अनाथ की तरह छोड़ दिया है. और फिल्म जहाँ पर जाकर ख़त्म होती है वहां उसकी कड़ियाँ भले ही दोनों की जोड़ी ने किसी तरह जुडी हुई दिखलाई हों लेकिन वह बिखरी हुई ही दिखती हैं. फिल्म के कई प्रसंग ऐसे हैं जो रोचकता के ख्याल से तो बहुत अच्छे हैं लेकिन उनकी कोई सार्थकता नहीं है. और बाद में वो लेखक और निर्देशक दोनों के ही गली की हड्डी बन गए हैं जिनसे ये दोनों अपना पल्ला छुड़ाने के लिए हाथ खड़े कर देते हैं. ऐसे किरदारों में जस्सी, उसकी पत्नी पायल, उसकी बहन, चिंटू, अवस्थी और तनु और मनु के माता-पिता शामिल हैं. ये सब फिल्म में सहायक किरदार के तौर पर शामिल होते हैं. एक तरह से कहें तो लेखक ने इन्हें अपने मकसद तक पहुँचने के लिए इस्तेमाल भर किया है और इस्तेमाल के बाद तो कई बार बड़ी बेरहमी से उठाकर बाहर भी फेंक दिया है. जस्सी की बहन के अपहरण के बाद उसे जिस तरह कहानी से गायब कर दिया जाता है कि लेखक के पास उसे लेकर कोई योजना नहीं थी. कहानी की कड़ियों को जबरदस्ती जोड़ने भर के लिए उस घटना का इस्तेमाल किया गया है. लेखन की किसी भी विधा में अपने ही द्वारा गढ़े गए इन पात्रों के साथ इस तरह का सलूक अच्छा नहीं माना जाता. हर किरदार की अपनी दुनिया होती है वह दूसरे की ज़िन्दगी में अपनी ज़िन्दगी छोड़कर शामिल नहीं होता बल्कि वह अपनी परेशानियों, चुनौतियों और अपेक्षाओं के साथ दूसरे की ज़िन्दगी में शामिल होता है. कुल मिलाकर यह फिल्म इसलिए भी याद की जाएगी कि यह एक तरफ तो जीवंत और जानदार किरदारों को गढ़ता है वहीँ दूसरी ओर खुद ही उन्हें पटरी से उतार देता है.

कई बार राजनीति हमारे जीवन में इस तरह भी आती है जब हम कह रहे होते हैं कि राजनीति से हमारा कोई लेना देना नहीं है. कई बार राजनीति से अरुचि दिखाने वाला भी राजनीति कर रहा होता है. उससे भी ज्यादा सतर्क उन लोगों से रहने की जरूरत होती है जिन्हें राजनीति की समझ नहीं होती या जो अपनी राजनीतिक नासमझी के बहाने ऐसी बातें कह जाते हैं जो सीधे-सीधे प्रतिगामी राजनीति को मदद पहुंचाती है. अफ़सोस की बात यही है कि यह फिल्म ‘तनु वेड्स मनु रिटर्न्स’ जाने-अनजाने ऐसे बहुत सारे काम कर जाती है. जैसा कि मैंने पहले ही कहा है कि अगर मैं इस फिल्म पर नहीं भी लिखता तो कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन यही चंद बातें हैं जिन्हें सामने लाना जरूरी था.

मानव सभ्यता ने कई सारे संघर्षों के बाद कुछ बुनियादी अधिकार अर्जित किए हैं. उनमें वैयक्तिक आज़ादी भी एक जरूरी चीज़ है. प्रेम करने, साथ रहने और अपनी पसंद की शादी करने की आज़ादी अपनी जगह है लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी आज़ादी है साथ पसंद न आने पर उससे बाहर निकालने की आज़ादी. भारतीय विवाह प्रथा में यह आज़ादी लोगों को नहीं रही है. यही कारण है कि लाखों-लाख लोग बेमेल शादियों में पिसते रहने को मजबूर हैं. हमें भूलना नहीं चाहिए कि शादी को पवित्र बंधन और परंपरा मानने वाला यह भारतीय समाज ही है जिसमें पति और पत्नी के रिश्ते पर सबसे ज्यादा जोक आज भी बनाए और बढ़ाये जाते हैं. जो दर्शाता है कि भारत में ज्यादातर लोग अपनी शादी से खुश नहीं हैं. अब ऐसे में उस रिश्ते को ढोने का क्या मतलब है जिसमें आप खुश ही नहीं है. लेकिन हमें उसे ढोना है क्यूंकि हमारे यहाँ शादी सात जन्मों का साथ माना जाता है. जिसके साथ एक घंटा काटना मुश्किल हो उसके साथ सात जन्म काटने की बात, है न मजाक? इस मजाक से मुक्ति का रास्ता तलाक है जो व्यक्ति को ऐसे बेमेल शादी से बाहर आने की इजाजत देता है. लेकिन हम भारतीय अपनी दकियानुसी सोच के कारण आज भी तलाक को एक अच्छी चीज़ नहीं मानते और बेमेल शादियों में घुटना हमें पावन और पवित्र लगता है. इस फिल्म के लेखक और निर्देशक ने यही किया है. उन्होंने तनु जैसे रेबेल किरदार से घुटने टिकवा दिए हैं. फिल्म का अंत आते-आते तो यह किरदार कुछ यूँ हो जाता है जैसे वह दया की भीख मांग रही हो. इस किरदार के साथ यह ट्रीटमेंट कहीं से भी सटीक नजर नहीं आता.

इसकी पिछली कड़ी की बात न भी करें तो इस फिल्म के शुरुआत से लग्भव दो तिहाई हिस्से तक भी हमें जिस तनु के दर्शन होते हैं वो एक बिंदास और लापरवाह लड़की नजर आती है. उसे अपने पति को लंदन में पागलखाने में छोड़कर आने का कोई अफ़सोस नहीं है. वह अपनी ज़िन्दगी नए सिरे से शुरू करने की ख्वाहिश रखती है और इसी नाते अपने पुराने प्रेमियों को टटोलती है कि शायद उनमें से कोई उसके हाथ लग जाए. इस क्रम में वह इतना आगे निकल जाती है कि मनु के नोटिस और पत्र के जवाब में ‘बहुत हुआ सत्कार….’ जैसी गालियाँ भी बोल जाती है लेकिन उसे जैसे ही पता चलता है कि मनु नए तरीके से प्रेम कर रहा है वह उसे वापस पाने के लिए तड़पने लगती है. मुझे नहीं लगता की इतने बड़े कदम उठा लेने के बाद तनु को वापस उस ‘अदरक’ (मनु शर्मा) का स्वाद लेने वापस जाना चाहिए था. यहाँ लेखक और निर्देशक पर वही भारतीय शादियों की पवित्रता और उसकी सात साल की वैधता सवार हो गई है. ये दोनों उस कन्वेंशन को तोड़ने से बचते हैं और तनु से मनु के सामने सरेंडर करवा देते हैं. मतलब अगर शादी बचानी है तो यह लड़की की जिम्मेदारी है और झुकना तो उसे ही होगा. इस प्रयास में उससे ‘हम जरा बेवफा क्या हुए आप तो बदचलन हो गए’ जैसा फैशनेबुल जुमले भी बुलवाया गया है जिसका कोई अर्थ समझ में नहीं आता. जबकि जरूरत इस बात की थी कि अगर तनु के किरदार को मनु को डंप करके आगे निकल जाते हुआ दिखलाया जाता तो बेहतर होता.

वहीँ मनु शर्मा कुसुम उर्फ़ दत्तो से शादी के आखिरी फेरे लेते हुए रुक जाते हैं. इसका कोई जवाब हमें नहीं मिलता. क्या मनु शर्मा छह फेरे लेने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि वो दत्तो को प्यार नहीं करते? क्या मनु शर्मा ने सच में दत्तो से प्यार किया भी था? अगर मनु शर्मा ने दत्तो से सच में प्यार किया था तो क्या वापस तनु के साथ रिश्ता बना लेने के बाद दत्तो से प्यार नहीं करता रहेगा? क्या एक प्यार के लिए दूसरे प्यार को भूल जाना ही एकमात्र रास्ता है? ऐसे बहुत सारे सवाल हैं जो फिल्मकार ने अनुतरित छोड़ दिए हैं. लेकिन एक बात जो इन सवालों से भी ज्यादा भयावह है और डराती है वह यह कि लेखक ने कहीं इसलिए तो इस शादी को परवान चढ़ने से रोक नहीं दिया कहीं इस शादी से समाज के साथ उसके भीतर का विश्वास भी दरक जाता. भला एक ब्राह्मण और एक जाट के बीच शादी यह समाज और उससे उपजा लेखक कैसे पचा पाता? वह भी तब जब लेखक हिमांशु शर्मा का गढ़ा नायक भी शर्मा जी ही है. भारतीय जाति व्यवस्था हमारे भीतर बहुत गहरे तक धंसी हुई है. अगर हम वैचारिक तौर पर बहुत मजबूत नहीं हैं और उससे लगातार सचेत नहीं हैं तो हम कभी भी उसके दलदल में गिर सकते हैं. लेखक शर्मा जी अंतत उसी दलदल में गिर गए हैं और इसीलिए वह कुसुम के बरक्स तनु त्रिवेदी की वापसी मनु शर्मा के जीवन में करवाते हैं.

मैं इस निष्कर्ष तक शायद नहीं भी पहुँचता अगर अपनी कहानी के ट्विस्ट में हिमांशु शर्मा ने हरियाणा के गैर-कानूनी और खूनी खाप पंचायत को इतना असहाय और सामान्य तरीके से पेश नहीं किया होता. हम सब इस हकीक़त से परिचित हैं और कमोबेश रोज ही खाप पंचायतों द्वारा प्रेमी युगलों कि हत्या से करवा दिया जाता है कि देश के उस इलाके में भारतीय संविधान और twm1कायदे कानून का कोई अस्तित्व नहीं है. हज़ारों प्रेमी युगलों को इन खाप पंचायतों द्वारा सरेआम मौत के घाट उतार दिया गया है और रोज ही ऐसी घटनाएँ देखने सुनने में आ रही हैं. ऐसे समाज को बड़े भाई के एक फ़िल्मी भाषण से जिस तरह उन्होंने सुधार दिया है वह काबिलेतारीफ है. यही नहीं उसके बाद तो जैसे सारा गाँव ही इस शादी के लिए बिछ जाता है. फिर क्या है इसी गाँव में ही ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ रिटर्न देखने को मिल जाता है. ऐसा लगता है जैसे गाँव में मैरिज टूरिज्म चल रहा हो. जहाँ लोग बाहर से आते रहते हैं और गाँव में कहाँ समा जाते हैं यह पता ही नहीं चलता. भाई लेखक महोदय, यह छूट भी कहीं आपने मनु जी को इसलिए तो नहीं दिलवा दी कि वो आपकी तरह ‘शर्मा’ जी हैं. एक बेहद ही जटिल और समस्याग्रस्त समाज को जब आप इतनी आसानी से सुधार देते हैं तो दरअसल आप उसकी अच्छी छवि गढ़ रहे होते हैं. ज़ाहिर सी बात है कि उस इलाके की हकीक़त से वाकिफ होने के बाद भी यह सब बिना सोचे-समझे तो हुआ नहीं होगा. यहीं आकर यह फिल्म रूपवाद में ढंकी ऐसी राजनीति कर जाती है कि उसके लिए इसे बक्क्षा नहीं जा सकता. और यहीं आकर यह स्पष्ट भी हो जाता है कि भारतीय जातिवादी और रूढिगत परंपरा को यह फिल्म खाद-पानी देने का काम कर रही है. मनु शर्मा और कुसुम की शादी का न होने देना भी इसी बड़ी योजना का हिस्सा भर है. संभव हो मेरा यह निष्कर्ष कई लोगों को कुछ ज्यादा ही अनुमान आधारित लगे पर कहानी जिस तरह से ट्विस्ट की जाती है वह तो मुझे यही सिखाती है.

एक निर्देशक के तौर पर आनंद राय ने फिल्म निर्माण पर गहरी पकड़ बना ली है. उनकी फ़िल्में दर्शकों को अपने साथ बांधती ही नहीं बल्कि बहा ले जाती है. और यही वह जादू है जिसके कारण उन्होंने अपना एक बड़ा दर्शक वर्ग बना लिया है. हालाँकि वह इसके लिए लोकप्रियतावाद का भयानक सहारा लेते हैं और चालू जुमलों-मुहावरों और मजाकिया चीज़ों का भरपूर इस्तेमाल अपनी फिल्म में करते हैं. दूसरी जो एक कमाल की बात है कि वह फिल्म दृश्यों, स्थितियों और किरदारों के माध्यम से रचते हैं. उनकी फिल्मों में हर दृश्य अपने आप में एक स्वतंत्र ईकाई की तरह दिखते हैं आप उनका बिना किसी सन्दर्भ के भी मजा ले सकते हैं. हालाँकि वे दृश्य एक-दूसरे से जुड़े हैं लेकिन वह अपने साथ कोई बैगेज लेकर नहीं चलते. दर्शक हर दृश्य का मजा ले सकता है. यही वह खेल है जिससे आनंद एक तरफ तो अपनी फिल्मों की सफलता की कहानी लिखते हैं वहीँ दूसरी तरफ दृश्य बनांने की जद्दोजहद में काफी सारे अवांतर चीज़ें भी जोड़ देते हैं.

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जो भी लोग कैमरा से परिचित हैं वो यह बात अच्छी तरह समझते हैं कि कैमरा दृश्यों के बैकग्राउंड को भी उतनी ही बारीकी से पकड़ता है जितना कि सामने के पात्रों और उसके हाव-भावों को. ऐसे में अगर पात्रों के बैकग्राउंड में बहुत इन्तेरेस्तिंग चीज़ें न डाली जाएँ तो कैमरा उसके खोखलेपन को जाहिर कर देगा. कैमरे का फ्रेम जितना बढ़ता जाता है यह संकट उतना ही बढ़ता जाता है. इसे चालू शब्दों में ऐसे भी समझा जा सकता है कि जैसे जैसे कैमरे का मुंह खुलता है वैसे-वैसे वह चीज़ें मांगने लगता है. यही कारण है कि दृश्यों को चमकदार और इंटरेस्टिंग बनाए रखने के लिए आनंद अपने पात्रों के बैकग्राउंड में काफी सारे मटेरियल परोसते हैं जिनक कहानी से कोई खास लेना देना नहीं होता लेकिन वह कैमरे के लिए जरूरी होता है. इस फिल्म में उन्होंने अपनी इस तकनीक को और भी मांजा है. इस फिल्म में कई ऐसे दृश्य हैं जो कैमरे के लिए रचे गए हैं. जैसे जब तनु पप्पी को फ़ोन करके बताती है कि वो मनु को जाकर छुडवा लें तो तब वह मनु के घर में ही होता है और बच्चों से खेल रहा होता है. यह बच्चे बाद में कभी नहीं दीखते. तनु जब अवस्थी जी से मिलने जाती है तो घर में पूजा चल रही है. वह भी सिर्फ कैमरे के लिए ही रचा गया है. अपनी बहन को देखने आए लड़के के सामने तौलिये में बाहर निकल आना भी दृश्य की सार्थकता कम उसकी दर्शनीयता के हिसाब से ज्यादा तय की गई है और उसका खामियाजा उस दृश्य को भुगतना भी पड़ा है क्यूंकि तनु द्वारा कही सारी अच्छी बातें बेकार के कहकहों की भेंट चढ़ गई है. ऐसे ही न जाने कितने दृश्य हैं जो कैमरे की खुराक के लिए बैकग्राउंड के तौर पर रचे गए हैं. शादी के दृश्यों से फिल्म को भरने की कोशिश भी दरअसल इसी कड़ी का हिस्सा है. कई बार तो यह दृश्य के साथ चले जाते हैं लेकिन कई बार उनका इस्तेमाल अतिरेक भी पैदा करता है. जैसे जस्सी के बहन की शादी के दृश्य में यह अतिरेक की तरह दिखता है. वही हाल दत्तो से शादी करते वक़्त का भी है. फेरे लेते वक़्त ही मना करना उसी कैमरे की मांग और अतिरिक्त नाटकीयता पैदा करने की कोशिश का हिस्सा लगता है. यहीं आकर निर्देशक रूपवाद का शिकार नजर आता है जिसके लिए फिल्म के कंटेंट से ज्यादा उसका फॉर्म जरूरी हो जाता है. मैं जब ऊपर फॉर्म के हावी होने की बात कर रहा था तो उसका आशय इसी से था. निर्देशक पूरी फिल्म को एक फॉर्म में reduce कर देने को आतुर दिखता है.

जहाँ तक बात अभिनेताओं के प्रदर्शन की की जाए तो इस मामले में यह फिल्म कमाल की है. इस फिल्म से जुड़े सारे कलाकारों ने कमाल का काम किया है. इस फिल्म की ताकत इसके अभिनेताओं का बेजोड़ परफॉरमेंस ही है जिसके कारण लोग इसके दीवाने नजर आ रहे हैं. कंगना राणावत की जितनी तारीफ की जाए वह उतना ही कम है. तनु और कुसुम के दो अलग-अलग किरदारों को जिस तरह से उन्होंने जीवंत कर हैरतंगेज कर देने वाले अभिनय का मुजाहिरा पेश किया है वह अविश्नीय है. खासकर तनु और दत्तो के किरदार को उन्होंने जिस तरह से अलग किया है वह हिंदी फिल्म उद्योग में अब तक किसी भी अभिनेता या अभिनेत्री द्वारा किए गए दो भुमिकाओं में श्रेष्ठ कहा जा सकता है. उन्होंने दोनों ही किरदारों की भाषा, चाल-ढाल, बात करने के तरीके और किरदारों के मैनेरिज्म पर जबरदस्त काम किया है. दोनों को देखकर कहीं से भी नहीं लगता कि वो एक ही अभिनेता द्वारा किए गए किरदार हैं. मनु की भूमिका को माधवन ने जिस तरह undertone प्ले किया है वो भी काबिलेतारीफ है. उनका यही अंदाज़ इस किरदार को जीवंत बना देता है. वह इस किरदार को किसी भी मध्यवर्गीय परिवार में पले-बढे एक अच्छे संस्कारी बच्चे का किरदार बना देते हैं जिसने जीवन में कभी कोई गलत हरकत तक न की हो और सिर्फ और सिर्फ पढाई से वास्ता रखा हो. पप्पी की भूमिका में अभिनेता दीपक डोबरियाल ने भी भरपूर मजे किए और दिए हैं और पूरी फिल्म के फोकस में खुद को रखा है. अपने खिलंदड़ी अंदाज के कारण वह हर दृश्य में जान डाल गए हैं. इनके अलावा अवस्थी की भूमिका में जिम्मी शेरगिल भी जबरदस्त रूप से जंचे हैं. अन्य भूमिकायों में भी स्वरा भास्कर, के.के.रैना. राजेंद्र गुप्ता, जीशान और अवनि परिहार ने भी अपनी छाप छोड़ी है. फिल्म का संगीत और पार्श्व संगीत दोनों ही फिल्म के दृश्यों के अनुकूल है और गानों के बोल बेहद उम्दा हैं. हालाँकि लगता तो नहीं है कि सफलता के चरम पर यह टीम उम्मीद अभी कुछ सीखने के मूड में होगी पर फिर भी इस टीम को मेरी बिना मांगी सलाह यही होगी कि फिल्म बनाने का ग्रामर तो इन्होने सीख लिया है पर अगर कंटेंट पर थोड़ी मेहनत कर लें तो शायद यह टीम लोकप्रियतावाद से भी बच जाए और सिर्फ सफल नहीं बल्कि सार्थक फ़िल्में भी देने में कामयाब हो पाए.

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