देश की सोच का हाईवे : एनएच-10

मृत्युंजय प्रभाकर

12-1426155555-05-1423111780-nh10-new-poster    लीजिए फिर हाज़िर हूँ एक ऐसी फिल्म के साथ जिसमें दिखाने को तो बहुत कुछ नहीं है और जो दिखाया जा रहा है वो भी बहुत ही देखा-सुना-जाना सा है लेकिन फिर भी जरूरी है क्यूंकि अगर झूठ को बार-बार दुहराने से सच मान लिया जाता है तो सच के दुहराव में ही आखिर क्या बुराई है. एनएच-10 को आप चाहें तो एक बेहद ही सतही फिल्म मानकर नकार दे सकते हैं. आप यह कहने को स्वतंत्र हो सकते हैं कि फिल्म में जैसी परिस्थितियां दिखलाई गई हैं वो वास्तव में संभव नहीं हैं. फिल्म के चलते रहने के दौरान मैं भी बार-बार उसकी घटनाओं से असहमत होता रहा. फिल्म के कई पड़ाव हैं जो अविश्वश्नीय तो हैं हीं, साथ ही साथ बेहद लचर हैं जिन्हें किसी भी तरह न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता. लेकिन फिल्म या कोई कलात्मक अभिव्यक्ति तो आम तौर पर ऐसी ही घटनाओं पर आधारित होती हैं जो ‘रेयररेस्ट ऑफ़ रेयर’ होती हैं और जिसे समाज के बीच सिर्फ एक रचनाकार ह्रदय ही पकड़ पाता है. आप जो कॉमेडी के नाम पर कुछ भी उल-जुलूल, बिना सर-पैर कि कहानी बर्दाश्त कर लेते हैं क्या जीवन के इतने नजदीक की विसंगतियों पर बने एक अतार्किक सी प्रतीत होती पर सही सवाल उठाती एक फिल्म नहीं बर्दाश्त कर सकते. अगर सच में नहीं कर सकते तो समझ लीजिए आपने इंसान होने तक की तमीज खो दी है.

कहते हैं हमारा देश ‘विरूधों का सामंजस्य’ है. बहुत सही कहते हैं. अब देखिए न, कैसा विचित्र देश है यह. जहाँ दिल्ली-मुंबई जैसे महानगरों के युवा जब बार-बार प्यार में डूबता-उतराते प्यार पर से भरोसा खो चुके हैं. दिल्ली जहाँ सैकड़ों ऐसे क्लब हैं जहाँ एक रात के लिए पत्नियों की अदला-बदली आम बात है. वहीँ उससे मात्र 50-60 किलोमीटर की दूरी पर आज भी हरियाणा के लौंडे हर महीने उसी प्यार के चक्कर में जान को जोखिम में डाल  रहे हैं और जान गँवा भी रहे हैं. वही हरियाणा जहाँ के लौंडे उज्जड-गंवार और पता नहीं क्या-क्या समझे जाते हैं. हालाँकि यह भी सच है कि उन युवाओं की जान लेने वालों में भी सबसे आगे युवा ही हैं लेकिन क्या इससे यह बात भूल जानी चाहिए की जान देने वाले भी युवा ही हैं जो अपना प्यार पाने के लिए अपने जान की कुर्बानी तक देने को आतुर हैं वो भी यह जानते हुए कि पकड़े जाने पर उनके साथ ठीक वैसा ही व्यवहार किया जाएगा. आखिर हम कब तक विजेताओं का इतिहास लिखते रहेंगे. कब हम इतने समझदार होंगे कि उन विजयी मुस्कानों के पीछे दबी लहू की लाली को दर्ज कर सकें. एनएच-10 और कुछ नहीं भी करती है तो कम से कम उसे दर्ज तो करती ही है.

mh1009-feb6यकीन मानिए ‘ऑनर किलिंग’ पर मैंने और भी फ़िल्में देखीं हैं जिनमें भारत और विदेशों में बनी फ़िल्में शामिल हैं. मैंने हरियाणा के ‘ऑनर किलिंग’ पर ही बनाई एक बेहद ही घटिया फिल्म भी देखी है जिसे देखकर प्रेमी युगल से ज्यादा फिल्म बनाने वालों पर ही दया आ गई थी. ‘ऑनर किलिंग’ तीसरी दुनिया के देशों की एक ऐसी भयानक सच्चाई है जिससे मुंह नहीं मोड़ा जा सकता. हालाँकि हम फिर भी यह पाते हैं कि 99 प्रतिशत प्रेम कहानी बनाने वाले बॉलीवुड के निर्माता-निर्देशकों का ध्यान इस विषय के ऊपर कम ही गया है. ज्यादातर प्रेम कहानिओं में जहाँ अंत में नायक-नायिका मार दिए जाते हैं उनके पीछे भी खानदानी दुश्मनी की भूमिका ज्यादा दिखलाई गई है और प्रेम के दुश्मन समाज को छुपा लिया गया है. एनएच-10 एक सतही फिल्म होते हुए भी अब तक की सबसे महत्वपूर्ण फिल्मों में है जो दर्शकों का ध्यान इस मुद्दे की ओर खींचने में सफल रही है.

एनएच-10 की कहानी बहुत ही सीधी और सपाट है. गुडगाँव का एक सफल युवा जोड़ा एक देर रात की पार्टी में जाता है. लड़की को अचानक किसी जरूरी काम से ऑफिस जाना होता है. पति पार्टी से नहीं निकल पाता तो वह अकेले ही निकल लेती है (जो आम तौर पर अविश्वसनीय है खैर). रास्ते में उसे कुछ मवाली टाइप लोग मिलते हैं जिनसे बचकर वह मुश्किल से निकल पाती है. पुलिस कम्प्लेन लिखाने जाने पर उन्हें नसीहत मिलती है कि गुडगाँव बढ़ता हुआ बच्चा है तो उछल-कूद तो करेगा ही इसलिए एक तो अकेले न निकलें उस पर अपनी सुरक्षा चाहते हों तो एक लाइसेंसी पिस्टल ले लें (जो वो ले भी लेते हैं). खैर, पिछली पार्टी में हुए बेमजा को ठीक करने के लिए पति पत्नी के बर्थडे पर उसे बाहर लेकर जाता है. रास्ते में हाईवे पर वे एक जगह रुकते हैं. जहाँ भाग रहे एक प्रेमी युगल को लड़की का भाई और उसके परिवार वाले पकड़ लेते हैं और उनकी हत्या के इरादे से जंगल के बीच ले जाते हैं. पति बीच-बचाव के चक्कर में एक थप्पड़ खाता है और फिर उनके पीछे लग जाता है (जो आम तौर पर अविश्वसनीय है खैर).  official-trailer-of-nh-10-film-starring-anushka-sharmaइस साहस पर कि उसके पास एक पिस्टल है, यह भूलते हुए कि उसके पास एक क्रिमिनल माइंड नहीं है. यह साहस से अधिक उसके ईगो का मसला हो जाता है. पत्नी के मना करने के बावजूद वह ऐसी गलती करता है जो शायद ही कोई मध्य वर्ग का बच्चा करेगा (जो आम तौर पर अविश्वसनीय है खैर). पत्नी को कार में छोड़ वह उनके पीछे जाता है जहाँ वह अपनी आँखों के सामने उनकी क्रूर हत्या को अंजाम देते हुए देखता है. इधर कार के पास एक मानसिक तौर पर विकलांग बच्चा आता है जिसे गैंग ने पता नहीं किसलिए इधर ही छोड़ रखा है (अव्वल तो हत्यारे ऐसे लड़के को हत्या के मिशन पर अपने साथ ले ही क्यूँ जाएंगे, खैर). इधर पति हत्यारों को डराने के ख्याल से उन पर गोली चलाकर भागता है और रास्ते में मानसिक तौर पर विकलांग लड़के को पाकर उसे हटने को कहता है लेकिन तब तक वह गिरोह की चपेट में आ जाता है. बाकी जो है वो उनके बीच की लुका-छिपी है, लड़ाई है जिसमें पति बुरी तरह घायल हो जाता है, खैर. पत्नी उसे बिल्कुल देखने लायक जगह में छोड़कर, वापस आने का वादा करके सहायता पाने की उम्मीद में दौड़ लगाती है. वह पुलिस से टकराती है, धोखा खाती है और इस तरह सहायता की उम्मीद में भागते-भागते हत्यारों के गाँव ही नहीं, उनके घर और यहाँ तक की लड़की के कमरे तक पहुँच जाती है. भागी हुई लड़की की माँ अपने गवरू सपूत को फ़ोन पर यह सूचना देती है और हत्यारी गैंग घर पहुंचती है. पत्नी यहाँ से भी जान बचाकर निकल लेती है और पति के पास पहुंचती है और पाती है कि उसकी हत्या कर दी गई है. फिर उसके भीतर इतनी हिम्मत आ जाती है कि वह बदला लेने के लिए हत्यारों के गाँव में वापस आती है और पुरे गैंग को ख़त्म कर देती है, जबकि गाँव वाले नाच देखने में मगन हैं (जो आम तौर पर अविश्वसनीय है खैर). चलिए फ़िल्मी ही सही पर न्याय तो हुआ. स्त्री ने इतनी हिम्मत तो दिखाई. याद कीजिए आम तौर पर यह भूमिका नायक निभाते हैं जब वो बहन या पत्नी की मौत का बदला खलनायकों को मारकर लेते हैं.

NH10-anushka-sharma-BHLमुझे समस्या इन अविश्वसनीय घटनाओं से उतनी नहीं है जितनी की फिल्म के सरलीकरण से है. अनुष्का नाच देखने में मगन गांववालों से मदद की गुहार नहीं लगाती और एक बच्चे की सहायता मांगकर सरपंच के घर जाती है क्यूँ? आखिर लेखक और निर्देशक ने गांववालों को इस पुरे घटनाक्रम से दूर क्यों रखा है? क्या वो मानते हैं कि प्रेमी युगल की हत्या का निर्णय मात्र परिवार का है? क्या ऐसे निर्णय खाप पंचायतों में नहीं होते? हरियाणा की पृष्ठभूमि में बनी फिल्म में ऑनर किलिंग को दिखाती फिल्म में ‘खाप’ का ज़िक्र तक नहीं आता, क्यूँ? जो पुलिस वाले और पुलिस अधिकारी समाज का भय बताते हैं और कहते हैं कि आखिर उन्हें ड्यूटी तो इसी समाज में रहकर करनी है. मुझे याद है आज से दो साल पहले हरियाणा के गुडगाँव से लगे इंद्री गाँव में एक पुलिस ऑफिसर से मुलाकात हुई थी जो दिल्ली में पोस्टेड थे लेकिन बेटिओं को गाँव में रखते थे ताकि उनकी बच्चियां भी दिल्ली की लड़कियों की तरह बिगाड़ न जाएँ. यही इस समाज की हकीक़त है और उसके पीछे खाप की ताकत है जिसे कांग्रेस, भाजपा, इनलो ही नहीं ‘आप’ भी अपना ‘बाप’ मानने लगी थी. क्या फिल्म का निर्देशक भी यहाँ अपने ही उठाये मुद्दे को लेकर बेईमान नहीं हो रहा? वरना यह कैसे संभव है कि फिल्म में ‘खाप’ की भूमिका पर कोई बात न आए और इसे निजी राग-द्वेष की लड़ाई बनाकर निपटा दिया जाए?

NH10-Trailerखैर, जैसा की मैंने पहले भी कहा था, स्क्रिप्ट और प्लाट की तमाम कमजोरियों के बाद भी, कहीं-कहीं रोड फिल्म की नक़ल प्रतीत होते हुए भी ऑनर किलिंग रूपी जिस विषय को यह छूती है, वह प्रशंसनीय है. अनुष्का ने इस फिल्म में दिखाया है कि वो अपने कन्धों पर फिल्म को ढोने का साहस ही नहीं काबिलियत भी रखती हैं. बतौर अभिनेत्री और निर्मात्री वह यह जोखिम लेने के लिए बधाई की पात्र हैं. निर्देशक नवदीप ने भी इसे रोचक बनाए रखने की भरपूर कोशिश की है. अनुष्का के अलावा फिल्म में दर्शन कुमार और दीप्ती नवल का काम बोलता है. फिल्म में गीत की जरूरत नहीं थी लेकिन फिर भी दो-एक गाने रखे गए हैं. उम्मीद करूँगा कि अगली फिल्मों में वह ऐसी बचकानी गलतियों से बचेंगे जो इसमें दिख जाती हैं.

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