भारंगम – कुछ रंग कुछ भंग

मृत्युंजय प्रभाकर

रंगप्रमेमियों के जीवन में रंग भरने वाला रंग महोत्सव राजधानी दिल्ली के सांस्कृतिक केंद्र के तौर पर विख्यात मंडी हाउस में इस बार 8-22 जनवरी तक गुलजार रहा. 8 जनवरी की शाम कमानी सभागार में इसका शुभारंभ हुआ. एशिया के इस सबसे बड़े नाटकों के कुंभ का उद्घाटन भारत की संस्कृति मंत्री कुमारी शैलजा ने किया. उनके साथ उद्घाटन के अवसर पर मशहूर अदाकारा शर्मिला टैगोर, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की अध्यक्ष अमाल अल्लाना और निदेशक अनुराधा कपूर उपस्थित थीं. भारत रंग महोत्सव का उद्घाटन समारोह हंगामेदार रहा. यह हंगामा राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की अव्यवस्था की वजह से ही उपजी थी. आयोजन के समय अव्यवस्था का आलम यह था नाटक के निर्देशक रतन थियम तक बहुत मुश्किल से सभागार में प्रवेश कर सके. प्रसिद्ध रंग समीक्षक और नाट्य विशेषज्ञ कविता नागपाल भी घंटों तक द्वार पर खड़ी रहीं. मीडियाकर्मियों को भी अंदर प्रवेश करने की इजाजत नहीं दी गई. उनके साथ ही बड़ी संख्या में रंगप्रेमी बाहर की धक्के खाते रहे. अंदर न जा पाने की खीज में न सिर्फ दर्शकों ने बल्कि रानावि के छात्रों तक ने हंगामा किया. इसी हंगामे के बीच महोत्सव का आगाज रबींद्रनाथ टैगोर लिखित नाटक ‘किंग ऑफ़ द डार्क चैंबर’ से हुआ. अपने अद्भुत रंगनिर्देशन के लिए भारत ही नहीं, दुनिया भर में विख्यात नाट्य निर्देशक रतन थियम ने इस नाटक को निर्देशित किया.

पूरे महोत्सव के दौरान रंग दर्शकों को कुल 95 प्रस्तुतियां देखने को मिलीं. संख्या के दुष्टिकोण से देखें तो यह संख्या निश्चित तौर पर काफी अधिक है. रंग महोत्सव में दर्शकों की भागीदारी को लेकर भी इसे काफी हद तक सफल माना जा सकता है. लेकिन जैसा कि पिछले कुछ रंग महोत्सवों से देखने में आ रहा है. इस रंग महोत्सव में भी कुछ ही रंग प्रस्तुतियों ने दर्शकों का ध्यान अपनी तरफ खींचा. जिन चुनिंदा नाटकों ने रंग महोत्सव में अपनी छाप छोड़ी, पहले चर्चा उन नाटकों की.

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पिछले तीस वर्षों से भारतीय रंगमंच को अपनी प्रस्तुतियों से समृद्ध करने वाले रतन थियम अपने नाटकीय प्रस्तुतियों के लिए देश ही नहीं, दुनिया भर में ख्यात हैं. ऐसे में भारत रंग महोत्सव की शुरुआत उनके नाटक से हो तो रंगप्रेमी इसे सोने पे सुहागा ही कहेंगे. 14वें भारत रंग महोत्सव के उद्घाटन के अवसर पर रतन थियम की प्रस्तुति के जादू से रंगप्रेमियों को दो-चार होने का मौका एक बार फिर मिला. कविगुरु रबींद्रनाथ टैगोर लिखित नाटक ‘किंग ऑफ़ द डार्क चैंबर’ की प्रस्तुति उनके निर्देशन में कोरस थिएटर ग्रुप, मणिपुर के कलाकारों ने की.

रतन थियम के नाटकों में युद्ध, उसकी विभीषिका और महिलाओं की स्थिति को खास तौर पर फ़ोकस किया जाता रहा है. ‘किंग ऑफ़ द डार्क चैंबर’ नाटक में भी उन्हीं स्थितियों को बहुत ही खूबसूरती से दर्शाया गया है. नाटक को अपने विजुअल लैंग्वज में जिस खूबसूरती से रतन थियम ने पिरोया है वह उसके शाब्दिक अनुवाद में कहीं से भी बाधक नहीं बनता है. उनके नाटकों की खासियत सिनेग्राफी रही है. रतन थियम अपने नाटकों में विजुअल इफेक्ट्स के जबर्दस्त उपयोग के लिए जाने जाते हैं. उनकी नाटक की भाषा में जितने अहम कलाकारों के संवाद होते हैं उससे अधिक अभिनेताओं की दैहिक नृत्यमूलक गतियां, पार्श्व संगीत, स्टेज पर बिखरते प्रकाशकीय रंगों का आलोक, वस्त्र योजना और स्टेज की साज-सज्जा भूमिका निभाते हैं. इन सबके बावजूद यह कहने में मुझे संकोच नहीं है कि ‘किंग ऑफ़ द डार्क चैंबर’ नाटक में रतन थियम की छाप तो जरूर दिखाई दी पर वह अपनी रंगत में नहीं दिखे.

हिंदी के नाटककारों में मोहन राकेश का नाम अग्रणी पंक्ति के लेखकों में शुमार किया जाता है. उनके लिखे कुल जमा साढ़े तीन नाटकों में तीन तो हिंदी के सर्वकालिक श्रेष्ठ नाटकों में शुमार हैं. यह भी कम आश्चर्य की बात नहीं है कि पौराणिक पृष्ठभूमि में लिखे उनके नाटक ‘आषाढ़ का एक दिन’ और ‘लहरों के राजहंस’ की नायिकाएं जहां प्रेम की एकनिष्ठता और पूरेपन को आयाम देती नजर आती हैं, वहीं आधुनिक पृष्ठभूमि और अपने समय में लिखा गया उनका नाटक ‘आधे-अधूरे’ की नायिका प्रेम की बहुवादिता और बिखंडन के बीच जीने को अभिशप्त है. इसी ‘आधे-अधूरे’ का मंचन कमानी सभागार में 14वें भारत रंग महोत्सव के अंतर्गत लिलिट दुबे के निर्देशन में हुआ. दरअसल, यह एक आधुनिक कामकाजी महिला की व्यथा-कथा है जो घर और नौकरी की जिम्मेदारियां निभाते हुए अपने जीवन में भी प्यार और संतोष के दो पल तलाशने के लिए भटकती है.

मूल नाटक में ही सभी पुरुष पात्रों के एक ही अभिनेता द्वारा प्रस्तुत किए जाने की व्यवस्था नाटककार ने की है. इस कारण नाटक में महेंद्रनाथ, सिंघानिया, जगमोहन, जुनेजा और काले कोट वाला आदमी यानी सूत्रधार की सभी भूमिकाएं मोहन आगाशे ने निभाईं. उन्होंने सभी पात्रों को जिस सहजता से दर्शकों के सामने प्रस्तुत किया है वह काबिलेतारीफ है. सावित्री की भूमिका में लिलिट दुबे ने भी अपनी भूमिका के साथ न्याय किया है. बिन्नी की भूमिका में इरा दुबे थोड़ी ज्यादा नाटकीय अंदाज अख्तियार करती हैं. नाटक के संवाद इस नाटक की जान हैं, अभिनेता उसे सही अंदाज में दर्शकों के सामने प्रस्तुत करते हैं. मंच सज्जा और प्रकाश योजना नाटक के अनुकुल है. कुल मिलाकर रंगदर्शकों को यह नाटक प्रभावित कर गया.

14वें भारत रंग महोत्सव में बड़े पैमाने पर युवा रंग निर्देशकों को मौका दिया गया है. राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के ही पूर्व छात्र प्रवीण कुमार गुंजन उनमें से एक हैं. पिछले तीन वर्षों से लगातार उनकी प्रस्तुतियां भारत रंग महोत्सव में आती रही हैं. ‘अंधा युग’ जैसी स्मरणीय प्रस्तुति से भारत रंग महोत्सव में अपनी शुरुआत करने वाले प्रवीण कुमार गुंजन इस बार अपनी एकल प्रस्तुति ‘समझौता’  के साथ हाजिर हुए जिसे उन्होंने रानावि के ही छात्र रहे अभिनेता मानवेंद्र त्रिपाठी के साथ तैयार किया है.

इस एकल प्रस्तुति में सबसे खास बात जो दिखती है, वह है इसकी प्रस्तुति शैली. एक रिंगनुमा विशेष स्टेज के घेरे में एक अभिनेता खड़ा है और अपनी अदाकारी से वह दर्शकों का दिल जीतता है. उसके अभिनय शैली में कोई भी रटा-रटाया फार्मूला नहीं है. वह सभी स्थापित अभिनय की रुढि़यों को तोड़ता हुआ, अपने गायन, शारीरिक गतियों, स्वर व शरीर आलोड़न, संवाद, सूत्रधारीय व्यक्तव्यों सहित कई तरह से दर्शकों से अपना संवाद स्थापित करता है. नाटक के आरंभ में यह युक्तियों भले ही लादी हुईं लगती हैं लेकिन नाटक का अंत आते-आते यही युक्तियां दर्शकों को अपनी गिरफ्त में ले लेती हैं.

निश्चित तौर पर प्रवीण कुमार गुंजन की यह प्रस्तुति एक यादगार प्रस्तुति है और इसे यादगार बनाने में सबसे बड़ी भूमिका इसके अभिनेता मानवेंद्र त्रिपाठी की है. जिस प्रकार की शारीरिक और शाब्दिक दक्षता वह अपनी इस प्रस्तुति में दर्शकों के सामने प्रस्तुत करते हैं वह काबिलेगौर है. हालांकि प्रस्तुति में कुछ चीजें ऐसी जरूर हैं जिनसे बचा जा सकता था, जैसे नाटक के बीच में डाले गए फिल्मी गीत. कुछ चुनिंदा रंगयुक्तियों के संदर्भ में भी यह कहा जा सकता है, पानी, रंग और दूसरी रंगयुक्तियां न सिर्फ बासी बल्कि आयातीत प्रतीत होती हैं. नाटक के पहले हिस्से में भी सुधार की गुंजाइश है. वहीं रानावि के ही छात्र रहे युवा निर्देशक पवित्र राभा की प्रस्तुति ‘किनो काओ’ ने भी दर्शकों का ध्यान अपनी ओर खींचने में सफलता पाई. सुदूर पूर्व असम से आई इस प्रस्तुति की खासियत यह है कि इसमें भाग लेने वाले सभी कलाकार बौने हैं और उन्हें राज्य भर से जुटाया गया है. वह अपने जीवन की व्यथा एक नया अनुभव देने वाली रंगशैली में दर्शकों से साझा करते नजर आए.

भारत रंग महोत्सव में नाटकों और उनकी परिकल्पना की चकाचैंध के बीच जिन नाटकों ने अपनी सादगी और अभिनय के कारण प्रभावित किया ‘बाघिन मेरी साथिन’ उनमें से एक है. नटमंडप, पटना की इस प्रस्तुति ने अभिनेता पर अपनी केंद्रियता के कारण खासतौर पर अपना प्रभाव छोड़ा. यह एक एकल प्रस्तुति थी जिसमें अभिनेता के तौर पर उपस्थित थे हिंदी रंगजगत के महत्वपूर्ण अभिनेताओं में से एक माने जाने वाले जावेद अख्तर खां. जावेद ने अपने अभिनय से अभिनेता की ताकत का भरपूर प्रदर्शन किया है. वह सूत्रधार, सैनिक, बाघिन और छोटू बाघ की भाव-भंगिमाओं, आवाज और शारीरिक हरकतों को इस तरह से परोसते हैं कि वह नाट्यधर्मी होते हुए भी दर्शकों को लोकधर्मी होने का अहसास देती है.

नाटक का निर्देशन पटना के चर्चित रंगनिर्देशक परवेज अख्तर ने किया है. परवेज अख्तर ने इस नाटक के निर्देशन के दौरान नाटककार और नाटक की मूल रचना का भरपूर खयाल रखा है. वह इसे रंगमंचीय चकाचैंध में फंसाने के बजाय पूरी तरह अभिनेता केंद्रित रखते हैं. मंच सज्जा से लेकर प्रकाश योजना तक में वह अभिनेता के ऊपर कुछ भी थोपने से बचते हैं. नाटक के अंत में वह भारतीय राष्ट्रीय राजनेताओं और पार्टियों को लाक्षणिक ढ़ंग से निशाना पर लेने से भी नहीं चूकते. यही राजनीतिक सूक्ष्मता उनके रंगमंच की ताकत रही है.

उषा गांगुली के निर्देशन में 14वें भारत रंग महोत्सव में कमानी सभागार में ‘चांडालिका’ का मंचन किया गया. रबींद्रनाथ टैगोर द्वारा लिखित इस नाटक को ‘रंगकर्मी’ संस्था के कलाकारों द्वारा प्रस्तुत किया गया. उषा गांगुली निर्देशित यह प्रस्तुति दर्शकों का ध्यान अपनी ओर खींचने में सफल रही. बंगाल जैसे गैर हिंदी प्रदेश में श्यामानंद जालान के बाद जिस शख्स का नाम हिंदी रंगकर्म को बढ़ावा देने वालों में लिया जा सकता है वह निश्चित तौर पर उषा गांगुली का ही है. उनकी प्रस्तुतियां देश भर में सराही गई हैं जिनमें ‘रूदाली’, ‘कोर्टमार्शल’, ‘काशीनामा’ आदि प्रमुख हैं. ‘चांडालिका’ निश्चित तौर पर उस स्तर की प्रस्तुति नहीं है जैसी ऊपर की ये प्रस्तुतियां रही हैं लेकिन यह निराश करने वाली भी नहीं है.

देश के रंगकर्म को समृद्ध करने में छोटे से राज्य मणिपुर की बड़ी भूमिका है. उसी मणिपुर में युवा रंगकर्मियों की भी एक जमात उभरकर सामने आई है जो अपने तरीके से रंगकर्म को सींच रही है. इसी नए जमात में शामिल एक नाम है हेस्नाम तोंबा का. तोंबा का एक खास परिचय यह भी है कि वह एच. कन्हाईलाल के बेटे हैं और कलाक्षेत्र, मणिपुर संस्था के साथ बचपन से सक्रिय हैं.

तोंबा की नई प्रस्तुति ‘हंगरी स्टोन’ उनके संस्थान और खुद के पिछले कामों को नया आयाम देती है. कलाक्षेत्र, मणिपुर ने जो एक खास नाट्यभाषा विकसित की है वह ध्वनियों, गति समूहनों, नृत्य गतियों, संगीत और आर्त स्वरों के मिश्रण से बनी है. उनके यहां शब्द भी उसी प्रकार नहीं रह जाते जैसे आम जीवन में हम शब्दों का इस्तेमाल करते हैं. उनके यहां स्वर और शब्द आलाप में बदल जाते हैं जो संगीत के बेहद करीब होता है. रबींद्रनाथ टैगोर द्वारा लिखित एक युवती की हृदयस्पर्शी कहानी पर आधारित यह नाटक ‘हंगरी स्टोन’ सिर्फ एक स्त्री की व्यथा-कथा न रहकर, स्त्री समाज की व्यथा-कथा में तब्दील हो जाता है. इसकी नाट्यभाषा को दर्शकों को चमत्कृत करने से ज्यादा दर्शकों को संवेदित करने के खयाल से बुना गया है और यही इस प्रस्तुति की ताकत है.

सीमा विस्वास का नाम रंगमंच में किसी परिचय का मोहताज नहीं है. दिल्ली और देश के रंगमंच पर उनकी उपस्थिति पिछले दो दशकों से बनी रही है. फिल्मों में नाम कमाने और सक्रियता रखने के बाद भी उनका रंगकर्म से नाता बरकरार रहा है. इस बार रंग महोत्सव में आई उनकी प्रस्तुति ‘स्त्रीरेर पत्र’ इस बात की गवाह है कि वह अभी तक चूकीं नहीं हैं. रबींद्रनाथ टैगोर लिखित इस कहानी के प्रदर्शन में अभिनय की जो मिसाल उन्होंने छोड़ी वह निश्चित तौर पर काबिलेगौर है. बंगाल की एक स्वतंत्रचेता स्त्री द्वारा घर छोड़ने के बाद अपने पति को लिखे पत्र पर आधारित यह प्रस्तुति कई मामलों में अभिनय का नया मापदंड खड़ा करती है. एक बच्ची से लेकर संपूर्ण स्त्री तक के किरदार को एक साथ जिस तरीके से वह मंच पर पेश करती है. जैसी भाव-भंगिमाओं से अपने शब्दों को भरती हैं, वह देखना विस्मयकारी रहा.

इनके अलावा बंगाल से आई संदीप भट्टाचार्य की प्रस्तुति ‘संताप’ ने आखिरी दिन श्रीराम सेंटर सभागार में अपनी छाप छोड़ी. यह नाटक हिजड़ों के जीवन पर आधारित है और उनकी वेदना को सामने लाने का काम करती है. वरिष्ठ रंगकर्मी और निर्देशक देवेंद्र राज अंकुर की प्रस्तुति ‘संपत्ति’ भी दर्शकों को भाई जो रबींद्रनाथ टैगोर की कहानी पर आधारित है. ‘कहानी का रंगमंच’ के संकल्पना के सूत्रधार देवेंद्र राज अंकुर ने अपने नाटकों से रंगमंच और अभिनय का एक नया व्याकरण गढ़ा है. ‘संपत्ति’ उनके पूर्व के काम और रंगमंचीय शैली को समृद्ध करने वाली प्रस्तुति है.

देश इस बार कविगुरु रबींद्रनाथ टैगोर की 150वीं जयंती मना रहा है. अपनी काव्यकृति ‘गीतांजलि’ के लिए नोबल पुरस्कार जीतने वाले देश के वह एकमात्र साहित्यकार हैं. रबींद्रनाथ टैगोर का योगदान नाटक के क्षेत्र में भी रहा है. उन्होंने 40 से अधिक नाटकों की रचना की है जिनमें कई संगीत नाटक भी शामिल हैं. उन्होंने अपने नाटकों को खुद भी निर्देशित किया है. उनकी इस महत्ता के कारण ही 14वां भारत रंग महोत्सव में इस बार टैगोर के नाटकों पर फ़ोकस किया गया. टैगोर लिखित नाटकों, कहानियों और उनके रचनाकर्म पर कुल 17 प्रस्तुतियां इस महोत्सव में शामिल की गई हैं. यह प्रस्तुतियां बंगाल ही नहीं देश के कई दूसरों राज्यों से भी आईं थीं.

भारत रंग महोत्सव इस मामले में भी खास होता है कि इसमें एक साथ बड़ी मात्रा में विदेशी नाटकों को देखने का अवसर मिलता है. इस बार भी विदेशों से बड़ी संख्या में प्रस्तुतियां आमंत्रित की गई थीं. महोत्सव के अंतर्राष्ट्रीय खंड में इस बार फ़ोकस पोलैंड के नाटकों पर था. इस महोत्सव में पोलैंड से आए तीन नाटकों ने विशेष तौर पर अपनी छटा बिखेरी. यह प्रस्तुतियां इसलिए भी खास हैं कि दुनिया में ‘पुअर थियेटर’ नाम की एक खास शैली का इजाद करने वाले ग्रोतोवस्की की रंग शैली को ध्यान में रखकर यह प्रस्तुतियां तैयार की गई थीं. उनके अलावा महोत्सव में इस बार कुल 11 देश शामिल हुए जिनमें इंग्लैंड, इटली, जापान, दक्षिण अफ्रीका, तुर्की, चीन, नेपाल, श्रीलंका, अफगानिस्तान और पाकिस्तान आदि शामिल हैं. पाकिस्तान से इस बार दो नाटक महोत्सव में आए. हालांकि दोनों ही नाटक औसत थे और दर्शकों का प्यार पाने में नाकाम रहे.

महोत्सव में हमेशा की तरह नाटक के क्षेत्र से जाकर फिल्मों में रंग जमाने वाले चेहरे भी अपनी छटा बिखेरते नजर आए. इनमें खास थे ‘सत्या’ फिल्म के कल्लू मामा के तौर पर प्रसिद्ध अभिनेता और निर्देशक सौरभ शुक्ला जो अपना कामेडी नाटक ‘रेड हॉट’ लेकर आए थे जिसे सराहना मिली. हालांकि ‘स्पर्श’, ‘कथा’ और ‘चश्मे बद्दूर’ जैसी फिल्मों की चर्चित निर्देशिका सई परांजपे का नाटक ‘जसवंदी’ दर्शकों का प्यार पाने में असफल रहा.

इस महोत्सव में देश भर से भारी संख्या में प्रस्तुतियां आती हैं. महोत्सव में सिर्फ देश ही नहीं, विदेशों से भी बड़ी मात्रा में प्रस्तुतियां आमंत्रित की जाती हैं. एक साथ देश और विदेशों में चल रहे रंग प्रयोगों को जानने-समझने का यह सबसे बेहतरीन अवसर होता है. लेकिन नाटकों के इस भीड़-भाड़ में बहुत कम संख्या में ही ऐसे नाटक आते हैं जो अपने रंगव्याकरण से आपको लुभा पाते हैं. सफलता का यह दर 20 प्रतिशत से भी कम है जो दर्शाता है कि सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है.

महोत्सव का दूसरा पक्ष यह है कि इसमें चुनकर आने वाले नाटकों के ऊपर सवाल उठते रहे हैं. इस महोत्सव के ऊपर रंग समीक्षक दीवान सिंह बजेली यह सवाल उठाते हैं कि इसमें देश का सही प्रतिनिधित्व नहीं होता. बहुत सारे राज्यों से एक भी नाटक नहीं होते जबकि कुछ राज्यों के नाटक भारी संख्या में होते हैं. प्रसिद्ध नाटककार और कवि एच.एस. शिवप्रकाश भी इस बात से सहमत हैं और कहते हैं कि भारत रंग महोत्सव जैसे आयोजनों का विकेंद्रीकरण होना चाहिए. यह महोत्सव दिल्ली ही नहीं, देश के दूसरे शहरों-कस्बों तक में ले जाया जाना चाहिए. नाटकों के चुनाव में मेरे खयाल से पारदर्शिता का भी अभाव है. इसमें सही तरीके से अलग-अलग राज्यों का प्रतिनिधित्व नहीं हो पाता. इसकी एक बड़ी कमजोरी यह भी है कि कुछ ही नाम इस महोत्सव में बार-बार सामने आते रहते हैं.

भारत रंग महोत्सव जैसे विशाल आयोजनों के नकारात्मक पहलू भी देखने में आए हैं. प्रसिद्ध रंगकर्मी और रानावि के पूर्व निदेशक देवेंद्र राज अंकुर इस चिंता को सार्वजनिक करते हुए कहते हैं कि नाट्य महोत्सवों के बढ़ने की वजह से शौकिया रंगकर्म प्रभावित हुआ है. अब लोग मौसमी नाटक करने लगे हैं. महोत्सव आने वाला है तो एक नाटक तैयार कर लिया. अपने स्तर पर रंगकर्म को गति देने का जो काम था जो जुनून था वह कम हुआ है. रंग संस्थाएं जो अपने बूते कुछ करती थीं, रंगकर्म को बढ़ाने का जो जज्बा था वह कम हुआ है.

आम दर्शकों के लिए इस आयोजन में टिकटों और आमंत्रण पत्रों का टोटा लगा रहता है. सभागार की ज्यादातर सीटें रिजर्व रखी जाती हैं और सीमित संख्या में ही आम दर्शकों को टिकट दिया जाता है. इस बार भी आलम इससे बेहतर नजर नहीं आया. इससे भी शर्मनाक बात यह नजर आई कि भाषाई नाटकों के कद्रदान बहुत कम दिखे. क्षेत्रीय भाषाओं से आए नाटकों को देखने में कम रुचि देखने में आई. यह दर्शाता है कि रंगदर्शक अभी भी परिपक्व नहीं हुए हैं. कुल 95 प्रस्तुतियों से लबालब इस महोत्सव में कुल 26 भाषाओं के नाटक देखने को मिले जिसमें तुल्लु, मिजो और राभा जैसी भाषाएं भी शामिल थीं. इससे पता चलता है कि महोत्सव में कितने विविध रंगी नाटक देखने को मिले. इस बार के महोत्सव में कई तरह की विविधता देखने में आई जहां पारंपरिक, आधुनिक, उत्तर-आधुनिक कई तरह की प्रस्तुतियों ने भारत रंग महोत्सव में अपने रंग बिखेरे.

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